सफरनामे

‘सर’ नाम वाले गाँवों से राजस्थान की रौनक की झलक

सालासर खाटू शयाम जी यात्रा भाग 2

कार अपनी गति से आगे बढ़ रही है। धूप निकल आई है। दिन अब गर्माहट पकड़ने लगा है।

सर नाम वाले गांवों के सड़क किनारे लगे बोर्ड

“भाई, क्या तुमने यहाँ गाँवों और शहरों के नामों पर गौर किया है?”
मैंने एक गाँव पार करते हुए विजयपाल से पूछा।

“कैसे?”
उसने संक्षेप में सवाल किया।

“हम जा रहे हैं बालाजी धाम, श्री सालासर। सालासर Salasar Dham के नाम के अंत में ‘सर’ आता है। और जिन गाँवों-शहरों से होकर हम गुजर रहे हैं, उनमें भी बहुत से स्थानों के नामों के अंत में ‘सर’ जुड़ा हुआ है,” मैंने कहा।

विजयपाल समझाने लगा,
“असल में भाई, हर क्षेत्र में कुछ खास नामों वाले गाँव होते हैं। जैसे अमृतसर साहिब की ओर गाँवों और शहरों के नामों के साथ ‘विंड’ शब्द बहुत देखने को मिलता है। पूआध क्षेत्र में ‘माजरा’ और मालवा में ‘खेड़ा’ व ‘पुर’ वाले नाम आम हैं।”

“तो यहाँ गाँवों-शहरों के नामों में ‘सर’ का क्या मतलब है?”
मैंने सवाल रखा।

आखिर हमारी यात्रा का उद्देश्य केवल धार्मिक यात्रा ही नहीं, बल्कि नई बातें जानना-समझना भी था।

विजयपाल जवाब दे, उससे पहले आप भी इस इलाके के कुछ ऐसे गाँवों और शहरों के नाम देखिए, जिनके अंत में ‘सर’ आता है। हनुमानगढ़ Hanumangarh पार करने के बाद ऐसे नाम लगातार मिलने लगते हैं—
रावतसर, नौरंगदेसर, ब्रह्मसर, पूरबसर, बिसरासर, जैतसर, कुसुमदेसर, साधासर, हरदेसर, भोजरासर, हरियासर, राणासर, मालासर, गोगासर, देरासर, संगासर, मेनसर, शोभासर आदि। लगभग हर दूसरे गाँव का नाम ‘सर’ से समाप्त हो रहा था।

विजयपाल ने ‘सर’ के रहस्य से पर्दा उठाया—
“यह इलाका पानी की कमी वाला रहा है। ‘सर’ शब्द ‘सर’ या ‘सरोवर’ से निकला है। जहाँ कहीं नीची और पक्की मिट्टी की जगह होती थी, वहाँ बारिश का पानी इकट्ठा हो जाता था। ऐसे तालाब या सरोवर के किनारे ही गाँव बस गए होंगे। जिस मुखिया का उस सरोवर पर अधिकार होता था, उसी के नाम से सरोवर और बाद में गाँव का नाम पड़ा होगा।”

पल्लू का ब्राह्मणी माता का मंदिर

रावतसर के बाद पल्लू Pallu नाम का कस्बा आता है। यहाँ ब्राह्मणी माता का मंदिर Brahamni Mata Temple दर्शनीय है। अब इलाका पूरी तरह रेगिस्तानी हो जाता है। सड़क किनारे रेत के टीले हैं। सड़क निर्माण के समय टीलों को समतल नहीं किया गया, जिससे रास्ता पहाड़ी सड़क जैसा आभास देता है—कभी नीचे उतरता है, तो थोड़ी दूर जाकर फिर किसी नए टीले पर चढ़ाई।

कहीं-कहीं सरसों और गेहूँ के खेत दिखाई देते हैं, जिन्हें स्प्रिंकलर सिंचाई से सींचा जाता है। जहाँ खेती नहीं है और जंगली क्षेत्र है, वहाँ राजस्थान का राजकीय वृक्ष खेजड़ी के अलावा कीकर आदि भी मिलते हैं। लेकिन जहाँ खेती होती है, वहाँ खेतों में प्रायः केवल खेजड़ी के पेड़ ही नजर आते हैं। राजस्थान में खेजड़ी काटने पर प्रतिबंध है, पर किसान इसके पत्ते काटकर बेचते हैं, जो भेड़-बकरियों के चारे के काम आते हैं।

इस इलाके में हरे-भरे खेत बहुत कम हैं, जबकि अधिकांश भूमि बंजर पड़ी है। किसानों ने भूमिगत जल से खेती शुरू की है। यदि मानसून में अच्छी बारिश हो जाए, तो मिट्टी की नमी को संभालकर वर्षा आधारित सरसों और चने की बुवाई कर ली जाती है। फिर दिसंबर के अंत या जनवरी में पश्चिमी विक्षोभ से हल्की बारिश हो जाए, तो फसल पक जाती है। अगर मानसून कमजोर हो, तो अधिकांश क्षेत्र में बुवाई नहीं हो पाती और खेती केवल वहीं होती है, जहाँ ट्यूबवेल की सुविधा है।

ट्यूबवेल अधिकतर दो इंच पाइप वाले हैं। खेतों को पंजाब की तरह समतल नहीं किया गया। ऊँचे-नीचे टीलों पर ही स्प्रिंकलर पाइप बिछाकर फसल उगाई जाती है।

एक और बात गौर करने लायक थी—जैसे पंजाब में अधिक मुनाफे के कारण कम पानी वाली फसलें छोड़कर धान की खेती को तरजीह दी जा रही है, वैसे ही राजस्थान में भी जहाँ ट्यूबवेल की सुविधा आई है, वहाँ सरसों छोड़कर रबी में गेहूँ को प्राथमिकता दी जाने लगी है, जबकि गेहूँ को सरसों से अधिक पानी चाहिए।

फवारा सिंचाई पद्धति से सिंचित हो रहे राजस्थान के खेत

यहाँ खेती भी अब मोटे तौर पर ट्रैक्टरों से होती दिखाई देती है। कई लोग खेतों में ही घर बनाकर रहते हैं। गेहूँ और सरसों Wheat and Mustard के खेतों में खरपतवार कम हैं और रासायनिक खादों का प्रयोग भी अपेक्षाकृत कम किया जाता है।

गाड़ी चलती जा रही है। हम सरदारशहर Sardar Shahar पार कर रतनगढ़ Ratangarh पहुँचते हैं। यहाँ से सीकर की ओर मुड़कर कुछ किलोमीटर आगे सालासर धाम Salasar Dham के लिए लिंक रोड निकलती है। इसी सड़क पर असली राजस्थान के दर्शन होते हैं।

यात्रा के दौरान यह भी ध्यान में आया कि अब कच्चे मकान बहुत कम हैं। अधिकांश लोगों ने पक्के घर बना लिए हैं। हाँ, खेतों में रहने के लिए झोपड़ियाँ और पशुओं के लिए कच्चे मकान अभी भी दिखाई देते हैं। विकास की हवा गाँवों तक पहुँच चुकी है।

रास्ते में एक बार फिर हम खेत किनारे रुकते हैं। घर से लाए गए गजरेले और पिन्नियों का स्वाद लिया जाता है। हम तय करते हैं कि दोपहर के भोजन के लिए नहीं रुकेंगे और मंदिर में माथा टेकने के बाद ही भोजन करेंगे।

सड़क के साथ-साथ एक मोटी भूमिगत पाइपलाइन भी जाती है, जिसके माध्यम से आगे के शहरों तक पीने का पानी पहुँचाया जाता है। यह पाइप इंदिरा गांधी नहर से शुरू होकर दूर-दराज के शहरों तक जाती है। कुछ स्थानों पर यह पाइपलाइन लीकेज करती हुई भी दिखाई देती है।

रतनगढ़ सीकर रोड से सालासर को मुड़ता रास्ता

रास्ते में आने वाले अधिकतर गाँवों की गलियाँ कच्ची हैं, हालांकि कुछ गलियाँ पक्की भी हैं। लेकिन गाँवों में कीचड़ कहीं नजर नहीं आता, क्योंकि यहाँ पानी की भारी कमी है और लोग पानी का बहुत संयम से उपयोग करते हैं। बड़े गाँवों में सरकार ने वाटरवर्क्स बनाए हैं, जहाँ से पाइप के जरिए पानी पहुँचता है, जबकि छोटे गाँवों और ढाणियों में लोग आज भी बारिश का पानी जमा करते हैं या टैंकरों से पानी मंगवाकर अपनी डिग्गी भरते हैं। जिस इलाके से हम गुजर रहे हैं, वहाँ कोई नहर नहीं है।

विजयपाल घोषणा करता है,
“बस पाँच किलोमीटर और—सालासर Salasar पहुँचने वाले हैं। तैयार हो जाओ।”
वह यहाँ अक्सर आता रहता है, लेकिन मैं पहली बार आया हूँ। हालाँकि यहाँ आने की इच्छा मुझे तब से थी, जब मैं नौवीं कक्षा में पढ़ता था। तब मेरे कुछ सहपाठी साइकिलों पर सालासर गए थे। नवरात्रों के दौरान सालासर में बहुत बड़ा मेला लगता है, तब लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं, जबकि सामान्य दिनों में भी यहाँ हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

चलता

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