श्री मुक्तसर साहिब, माघी और 40 मुक्ते
श्री मुक्तसर साहिब: माघी मेला और 40 मुक्तों की अमर शहादत का इतिहास
श्री मुक्तसर साहिब (Sri Muktsar Sahib), माघी (Maghi) और 40 मुक्तों को समझने से पहले हमें इतिहास में थोड़ा और पीछे जाना होगा।

गुरु गोबिंद सिंह जी आनंदपुर साहिब में भारत की सोई हुई कौम को धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से जागृत कर रहे थे तथा उन्हें अपने धर्म और देश की रक्षा के लिए तैयार कर रहे थे, ताकि विदेशी आक्रमणकारी यहाँ आकर हमारे लोगों की हत्या न कर सकें, हमारे धार्मिक स्थलों को नष्ट न कर सकें और देश की बहू-बेटियों को पशुओं की तरह अपने साथ न ले जा सकें।
यह सब मुग़लों को स्वीकार नहीं था। वर्ष 1704 में ऐसे ही हालातों में पहाड़ी राजाओं और मुग़ल सेनाओं ने गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh Ji) को आनंदपुर साहिब के किले में घेर लिया। यह घेरा बहुत लंबे समय तक चला। किले से कुछ सिख बाहर निकलते और गुरिल्ला युद्ध नीति के तहत मुग़ल सेनाओं को नुकसान पहुँचाते हुए शहीद हो जाते। धीरे-धीरे किले के भीतर राशन समाप्त होने लगा। ऐसे समय में लगभग 40 सिख गुरु साहिब के सामने उपस्थित हुए और कहा कि वे भूखे पेट युद्ध नहीं कर सकते और घर जाना चाहते हैं।
गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh Ji)ने उनसे कहा कि ठीक है, जा सकते हो, लेकिन लिखकर दे जाओ कि आज से न मैं तुम्हारा गुरु हूँ और न तुम मेरे सिख हो। उन्होंने ऐसा ही किया और यह बे-दावा लिखकर गुरु साहिब को छोड़कर किले से बाहर निकलकर अपने-अपने घरों की ओर लौट गए।
इसी दौरान गुरु साहिब और उनके परिवार ने भी अंततः किला छोड़ दिया। इसके बाद परिवार का विछोह हो गया और गुरु साहिब का परिवार अलग-अलग दिशाओं में बंट गया। छोटे साहिबज़ादे और माता गुजरी जी सरहिंद में शहीद हो गए। बड़े साहिबज़ादे चमकौर साहिब की लड़ाई में देश और धर्म के लिए बलिदान हो गए।

गुरु साहिब चलते-चलते मालवा क्षेत्र में आ गए। मुग़ल सेनाएँ अब भी उनका पीछा कर रही थीं। उधर जब बे-दावा लिखने वाले 40 सिख घर पहुँचे तो उनके परिवारों ने उन्हें इस कृत्य के लिए धिक्कारा और कहा कि उन्होंने कठिन समय में गुरु साहिब का साथ छोड़ दिया है और उन्हें कहीं भी मुक्ति नहीं मिलेगी।
माई भागो की प्रेरणा से इन सिखों ने अपनी भूल सुधारने और गुरु साहिब से मिलने का निश्चय किया। उन्हें पता चला कि गुरु साहिब मालवा क्षेत्र में हैं, तो वे भी उसी ओर चल पड़े। (भौगोलिक रूप से पंजाब को कई क्षेत्रों में बाँटा गया है और सतलुज नदी के दक्षिण के क्षेत्र को मालवा कहा जाता है।)
उस समय मालवा एक शुष्क क्षेत्र था, जिसे जंगल इलाका कहा जाता था। जहाँ आज श्री मुक्तसर साहिब शहर स्थित है, वहाँ उस समय खिदराने दी ढाब नामक स्थान था। इस क्षेत्र में तीन भाइयों—रुपाणा, धिगाणा और खिदराणा—ने तीन ढाब बनाए थे। ढाब वर्षा जल से भरने वाली जलाशय जैसी झील होती थी। वे 40 सिख और माई भागो खिदराने वाली ढाब पर पहुँचे और ढाब के किनारे डेरा डाल लिया।
इसी स्थान पर गुरु साहिब का पीछा करती हुई मुग़ल सेना भी पहुँच गई। सिखों ने युद्ध कौशल का प्रयोग करते हुए ढाब के किनारे झाड़ियों पर अपने कपड़े टांग दिए, जिससे दुश्मन को यह भ्रम हुआ कि आगे सिखों की एक बड़ी सेना डटी हुई है। इन सिंहों ने मुग़ल सेना का सामना किया। इसी दौरान गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh Ji) पास ही एक ऊँचे टीले पर पहुँच गए और वहाँ से मुग़लों पर तीरों से आक्रमण किया।

इस युद्ध में मुग़ल सेना पराजित हुई और भाग खड़ी हुई। यह युद्ध देसी पंचांग के अनुसार 21 वैशाख तथा अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार 3 मई 1705 को हुआ।
युद्ध समाप्त होने पर गुरु साहिब युद्धभूमि में पहुँचे, जहाँ शहीद सिखों के शरीर पड़े थे। 39 सिख शहीद हो चुके थे और केवल भाई महा सिंह ही अंतिम साँसें ले रहे थे। गुरु साहिब ने उनका सिर अपनी गोद में रखकर आशीर्वाद देते हुए पूछा—“महा सिंह, क्या वर माँगते हो?”
महा सिंह ने निवेदन किया—“गुरु साहिब जी, हमारा बे-दावा फाड़ दीजिए और हमारी आपसे टूटी हुई डोर फिर से जोड़ दीजिए।” गुरु साहिब ने ऐसा ही किया। इसके बाद भाई महा सिंह ने भी प्राण त्याग दिए।
गुरु साहिब ने इस स्थान को मुक्ति का सर होने का वरदान दिया और तभी से इस स्थान का नाम मुक्तसर पड़ा। आज यहाँ श्री मुक्तसर साहिब नामक शहर और पंजाब का एक ज़िला मुख्यालय स्थित है।
गुरु साहिब ने अपने हाथों से इन 40 सिखों का अंतिम संस्कार किया, जिन्होंने इस स्थान पर धर्म और देश के लिए महान बलिदान दिया था।
जिस स्थान पर गुरु साहिब (Guru Gobind Singh Ji) ने बे-दावा फाड़ा था, वहाँ आज गुरुद्वारा श्री टूटी गांडी साहिब सुशोभित है, जिसे दरबार साहिब भी कहा जाता है। हर वर्ष इस स्मृति में संगत यहाँ एकत्र होती है। यद्यपि यह युद्ध वैशाख महीने में हुआ था, लेकिन प्राचीन समय में वैशाख की गर्मी और जल की कमी को देखते हुए यह दिवस माघ महीने की पहली तारीख को मनाया जाने लगा। इसी दिन मकर संक्रांति होती है, जिसे पंजाब में माघी कहा जाता है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर 40 मुक्तों की महान शहादत को नमन करते हैं और सरबत के भले की अरदास करते हैं।
श्री मुक्तसर साहिब (Sri Muktsar Sahib) में गुरुद्वारा टूटी गांडी साहिब के साथ ही गुरुद्वारा शहीदां सुशोभित है, जहाँ 40 सिखों का अंतिम संस्कार किया गया था। इसी परिसर में गुरुद्वारा तंबू साहिब भी स्थित है, जो सिखों की युद्ध नीति और कौशल का प्रतीक है। यहाँ माई भागो की स्मृति में भी एक गुरुद्वारा है। इसके अतिरिक्त जिस स्थान से गुरु गोबिंद सिंह जी तीर चला रहे थे, वहाँ गुरुद्वारा टिब्बी साहिब स्थित है। साथ ही गुरुद्वारा रकाबसर साहिब और गुरुद्वारा दातनसर साहिब भी हैं।
गुरुद्वारा दातनसर साहिब के पास एक मुग़ल नूरुद्दीन की क़ब्र भी है। कहा जाता है कि नूरुद्दीन मुग़लों का जासूस था और भेष बदलकर गुरु साहिब (Guru Gobind Singh Ji) का पीछा कर रहा था। इसी स्थान पर जब गुरु साहिब दातन कर रहे थे, तो उसने पीछे से हमला किया। गुरु साहिब (Guru Gobind Singh Ji) ने अपने हाथ में पकड़े पानी के लोटे से उसके सिर पर वार कर उसे समाप्त कर दिया। जहाँ उसे दफनाया गया, वहाँ उसकी क़ब्र पर माघी के अवसर पर आने वाले श्रद्धालु उसके विश्वासघात के प्रतीक रूप में जूते मारते हैं।

इसके अलावा इस शहर में गुरुद्वारा तरनतारन साहिब भी स्थित है। पंजाब सरकार द्वारा 40 मुक्तों की स्मृति में मीनार-ए-मुक्ता का निर्माण किया गया है, जो एक दर्शनीय स्थल है।
श्री मुक्तसर साहिब (Sri Muktsar Sahib) से तलवंडी साबो जाते समय गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh Ji) कई गाँवों से होकर गुज़रे थे, जहाँ आज भी ऐतिहासिक गुरुद्वारे स्थित हैं। श्री मुक्तसर साहिब (Sri Muktsar Sahib) में 14 जनवरी को माघी के अवसर पर विशाल जोड़ मेला लगता है, जो कई दिनों तक चलता है। इस दौरान घोड़ों का मेला विशेष आकर्षण का केंद्र होता है, तथा 15 जनवरी को नगर कीर्तन और घुड़दौड़ भी आयोजित की जाती हैं।
श्री मुक्तसर साहिब (Sri Muktsar Sahib) में वर्ष के किसी भी समय आया जा सकता है, लेकिन माघी Maghi के अवसर पर यहाँ आना विशेष रूप से श्रेष्ठ माना जाता है। यह स्थान सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। निकटतम हवाई अड्डे बठिंडा और अमृतसर में स्थित हैं।
