परीक्षा केंद्र के अंदर का तनाव
— भूपिंदर सिंह बराड़, लोक संपर्क अधिकारी
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।। 3।।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: || 4||
धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान् |
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गव: || 5||
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् |
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा: || 6||
ये श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के तीसरे से छठे श्लोक हैं। इनमें दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के सामने पांडवों की सेना में शामिल वीर योद्धाओं का वर्णन करता है। यह वह समय था जब वह जीवन की सबसे बड़ी युद्धरूपी परीक्षा के सामने खड़ा था। उसके मनोभाव किसी परीक्षा के दौरान विद्यार्थी के मन में उत्पन्न होने वाले भय को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
वह विरोधी पक्ष के अनेक महारथियों का नाम लेता है—पांचों पांडवों के अतिरिक्त धृष्टद्युम्न, द्रुपद, विराट, धृष्टकेतु, चेकितान, काशीराज, पुरुजित, कुन्तीभोज, शैव्य, युधामन्यु, सौभद्र (अभिमन्यु) तथा द्रौपदी के पुत्र आदि। ये सभी उसे महान और शक्तिशाली योद्धा प्रतीत होते हैं।वह विरोधी पक्ष के 17 से ज्यादा योद्धाओं के नाम लेता है।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: |
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8||
इसके बाद आठवें श्लोक में वह अपनी सेना के महारथियों का उल्लेख करता है—गुरु द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और भूरिश्रवा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि विरोधी पक्ष के 17 योद्धाओं का नाम लेने वाला दुर्योधन अपने पक्ष के 7 योद्धाओं का ही उल्लेख कर सकता है।
एक दुष्ट प्रवृत्ति के व्यक्ति दुर्योधन की इसी मानसिकता से हम परीक्षा केंद्र के अंदर की विद्यार्थी की मनःस्थिति को समझ सकते हैं और परीक्षा रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करने की सीख ले सकते हैं।

यद्यपि दुर्योधन के सामने पराक्रमी योद्धा थे, लेकिन उसके पक्ष में भी भीष्म पितामह जैसे इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त योद्धा, गुरु द्रोणाचार्य जैसे अद्वितीय आचार्य तथा कर्ण जैसे महान धनुर्धर उपस्थित थे। फिर भी उसके मन का दोष यह था कि उसे अपने पक्ष की शक्ति कम और विरोधी पक्ष अधिक प्रभावशाली प्रतीत होता था।
परीक्षा केंद्र में भी विद्यार्थियों की यही स्थिति होती है। जब वे प्रश्नपत्र देखना प्रारंभ करते हैं तो उसमें कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जो शायद उन्हें न आते हों। वे प्रश्न उन्हें शत्रु सेना की तरह दिखाई देने लगते हैं। यदि प्रारंभ में ही कुछ कठिन प्रश्न दिख जाएँ तो मन विचलित हो जाता है।
जबकि उसी प्रश्नपत्र में अनेक ऐसे प्रश्न भी होते हैं जिनके उत्तर विद्यार्थी को भली-भांति आते हैं—अर्थात वे उसकी शक्ति होते हैं। परंतु जो कुछ कठिन या न आने वाले प्रश्न होते हैं, वे मनोबल को अधिक प्रभावित कर देते हैं और विद्यार्थी अपने उत्तर ठीक प्रकार से नहीं लिख पाता।

इसलिए महाभारत की यह कथा साझा की गई है ताकि विद्यार्थी समझ सकें कि जब वे बोर्ड परीक्षाओं में बैठें तो दुर्योधन की तरह उन प्रश्नों पर ध्यान न दें जो नहीं आते, बल्कि उन पर ध्यान केंद्रित करें जो अच्छी तरह आते हैं। संभव है कि पहले आसान प्रश्न हल करने से मनोबल बढ़े और कठिन प्रश्न भी कुछ हद तक हल हो जाएँ। प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में तो यह स्थिति और भी अधिक देखने को मिलती है।
परीक्षा के समय अर्जुन की तरह लक्ष्य पर एकाग्र रहना चाहिए। जैसे अर्जुन को केवल पक्षी की आँख दिखाई देती थी, वैसे ही विद्यार्थी को भी केवल अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यदि अधिक घबराहट हो तो एक मिनट के लिए आँखें बंद करें, मन को स्थिर करें, अपनी क्षमता को याद करें और पुनः उत्तर लिखना प्रारंभ करें—सफलता अवश्य मिलेगी।
महाभारत के अभिमन्यु की कथा भी स्मरणीय है। वह चक्रव्यूह में प्रवेश करना जानता था, परंतु उससे बाहर निकलने की विधि नहीं जानता था। विशेषकर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में ऐसे प्रश्न होते हैं जो अधिक समय लेते हैं और हल होने की संभावना भी कम होती है। ऐसे प्रश्नों में उलझकर अन्य सरल प्रश्न न छोड़ें, क्योंकि परीक्षा में समय का भी विशेष महत्व होता है।
इसके अतिरिक्त, परीक्षा केंद्र पर निर्धारित समय से पहले पहुँच जाना चाहिए। यदि देर होने का भय उत्पन्न हो जाए तो वह घबराहट पूरे प्रश्नपत्र को प्रभावित कर सकती है। परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र के प्रारूप (पैटर्न) का अध्ययन कर लें और प्रश्नपत्र में दी गई सभी निर्देशों को ध्यानपूर्वक पढ़ें।
जैसे महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण का संदेश अर्जुन के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हुआ, वैसे ही सही तैयारी और शांत मन परीक्षा में विजय दिला सकते हैं।
यदि किसी विशेष परिस्थिति में बोर्ड परीक्षा का कोई एक प्रश्नपत्र अच्छा न भी हो तो घबराएँ नहीं। अंतिम परिणाम सभी प्रश्नपत्रों के समग्र प्रदर्शन पर आधारित होता है।
इसलिए परीक्षा को एक त्योहार की तरह लें और उत्साहपूर्वक उसका स्वागत करें। सफलता आपका इंतजार कर रही है।
