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ग्रामीण राजस्थान, खेती और कुएँ वाले बालाजी का मंदिर

सालासर धाम व खाटू श्याम धाम की यात्रा भाग 6

खाटू श्याम Khatu Shyam से रात को किए गए फैसले के अनुसार हम सूरज निकलने से कुछ समय पहले ही निकल पड़े थे। आज हमें जीण माता मंदिर Jeen Mata Mandir और हर्ष पर्वत Harsh Pravta स्थित प्राचीन शिव मंदिर के दर्शन करने थे।

खाटू श्याम Khatu Shyam से अलौदा और कोछोर गांवों से होते हुए हम एक छोटी सड़क के रास्ते इस यात्रा की शुरुआत करते हैं। अभी थोड़ी ही दूर आए होंगे कि सड़क किनारे एक सुंदर मंदिर दिखाई देता है। हम रुकते हैं। यहां लगे बोर्ड पर इसे माता सीता का कुंड Sita Mata Kund Khatu लिखा हुआ है। हम मंदिर में माथा टेकते हैं। साथ ही सीढ़ीनुमा कुंड भी है। लेकिन यहां हमें इस स्थान के बारे में जानकारी देने वाला कोई व्यक्ति नहीं मिलता। फिर भी यह छोटा सा मंदिर उत्कृष्ट वास्तुकला का नमूना था।

थोड़ा आगे बढ़ने पर हमें इच्छापूर्णी लक्ष्मी माता Ichhapurani Laxmi Mata Mandir का प्राचीन मंदिर दिखाई देता है। यह हमारे यात्रा कार्यक्रम में शामिल नहीं था, फिर भी हम यहां रुकते हैं। यहां दो मंदिर हैं—एक इच्छापूर्णी लक्ष्मी माता का और दूसरा पास ही दक्षिण भारतीय शैली में बना नया श्री राधा-कृष्ण मंदिर Sri Radha Krishna Mandir । हम दोनों मंदिरों में माथा टेकते हैं। सूरज अभी पूर्व दिशा से ही निकला था। इस शांत वातावरण में पूरे परिसर का माहौल बहुत ही रमणीय और आध्यात्मिक प्रतीत हो रहा था। पूरे परिसर में भजन गूंज रहे थे।

“बराड़ साहब, आज हमारे पास समय है, रास्ते में जो भी देखने योग्य लगे, देखते चलेंगे,” गाड़ी में बैठते हुए विजय पाल ने कहा।

“बिलकुल, घूमने इसी लिए तो आए हैं। वैसे मेरी एक और इच्छा है कि हम यहां किसी स्थानीय परिवार के पास कुछ समय रुकें और उनके जीवन, यहां की खेती आदि के बारे में जानें,” मैंने विजय पाल की बात का समर्थन करते हुए अपने मन की बात कही।

जल्द ही हमारी यह इच्छा भी पूरी हो जाती है। आखिर अभी-अभी तो हम इच्छापूर्णी मंदिर में प्रार्थना करके आए थे।

सड़क किनारे, खेतों के पास बने एक घर के साथ एक किसान परिवार बैठा दिखाई देता है। हम एक-दूसरे की ओर देखते हैं और बिना कुछ कहे गाड़ी रोककर उनकी ओर बढ़ जाते हैं।

“मे पंजाब उ आया हाँ, राजस्थान घूमने और अठै गी खेती गै बारै म जानन खातर थारै कन्नै रुक्या हाँ” (हम Punjab पंजाब से आएं हैं, Rajasthan राजस्थान घूमने और यहां की खेती-बाड़ी Agriculture in Rajasthan के बारे में जानने के उद्देश्य से आपके पास रुके हैं) विजय पाल ने राजस्थानी बोली में लगभग 60–65 वर्ष के किसान से परिचय देते हुए कहा। वैसे हम दोनों राजस्थानी बोली समझ और बोल लेते हैं, इसलिए इस क्षेत्र में संवाद करने में हमें कोई परेशानी नहीं हुई। उल्टा, लोग अपनी भाषा में बात सुनकर और अधिक खुलकर बातचीत करते हैं।

पैरों में चप्पल, पैंट-शर्ट और सिर पर साफा बांधे किसान ने ठंड से बचने के लिए जैकेट पहन रखी थी। उनकी पत्नी पारंपरिक राजस्थानी पोशाक में थीं और सिर पर लाल रंग की ओढ़नी ली हुई थी।

उन्होंने बहुत आत्मीयता से हमारा स्वागत किया।

किसान का नाम महेंद्र कुमार था। वे अपनी पत्नी से हमारे लिए चाय-नाश्ते की व्यवस्था करने को कहकर हमें अपना खेत दिखाने लगे।

रेतीले टीलों पर उनका खेत है। ढाणी के पास ही कुआं बना हुआ है। कुएं को पहले लगभग 50 फुट गहराई तक ईंट और सीमेंट से पक्का किया गया है। उसके नीचे पत्थर है, और फिर पत्थर में खुदाई कर पानी तक कुआं बनाया गया है। कुएं की कुल गहराई लगभग 200 फुट है। इसमें से पाइप के माध्यम से पानी निकाला जाता है। सोलर सिस्टम भी लगा है और बिजली कनेक्शन भी है। अब राजस्थान में भी खेती Agriculture in Rajasthan के लिए बिजली मुफ्त कर दी गई है। लगभग 2 इंच की पाइप से पानी बाहर निकाला जाता है।

पूरी खेती स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई पर Sprinkler Irrigation in Rajasthan आधारित है। खेत में ही उनका घर है। पक्के मकान के साथ भैंसों और बकरियों के लिए झोपड़ियां बनी हुई हैं। उनके पास 5–6 भैंसें और 10–15 बकरियां हैं। बकरियों की झोपड़ी बहुत सुंदर थी।

महेंद्र कुमार ने लगभग 4 एकड़ में गेहूं बोया हुआ है और करीब 2 एकड़ में सब्जियां उगाई हैं। पानी का उपयोग किस तरह संयम से किया जाता है, यह इन किसानों से सीखने की जरूरत है। उन्होंने टमाटर, गेंदा, लौकी, बैंगन, पत्ता गोभी, प्याज, पपीता, मिर्च, बेर आदि की खेती की हुई है। सब्जियों में प्लास्टिक और घास-फूस से मल्चिंग की गई है ताकि पानी की बचत हो। सब्जियों में ड्रिप सिस्टम और गेहूं में स्प्रिंकलर सिस्टम से सिंचाई की जाती है।

खेत में खेजड़ी Khejari Tree: the State Tree of Rajasthan के पेड़ इसकी सुंदरता को और बढ़ा रहे हैं। खेत के चारों ओर बंजर इलाका है, जहां खेजड़ी और कीकर जैसे पेड़ हैं।

यह किसान प्राकृतिक खेती करता है। उनके ट्यूबवेल के पास खट्टी लस्सी और अन्य घोलों से भरे ड्रम रखे हुए थे, जिनसे वे फसलों को कीटों से बचाते हैं। सब्जियां बेचने के लिए वे सीकर मंडी जाते हैं, जबकि गेहूं की उपज 35 रुपये प्रति किलो के हिसाब से सीधे खेत से ही बिक जाती है। ज़हर-मुक्त उपज Organic Farming in Rajasthan होने के कारण उनकी फसल की मांग हमेशा बनी रहती है।

उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट (गंडोआ खाद) Wormi Compost का यूनिट भी लगाया हुआ है। पशुओं के लिए हरे चारे के साथ-साथ भूसा और खरीफ की फसल बाजरे के सूखे डंठल भी व्यवस्थित रूप से संभाल कर रखे गए हैं, ताकि सर्दियों में पशुओं को खिलाया जा सके।

यहां के किसानों की ट्रॉलियां पंजाब की तुलना में कुछ छोटी होती हैं, लेकिन उन पर की गई फूल-पत्तियों की चित्रकारी उन्हें आकर्षक बनाती है।

इतनी देर में घर की मालकिन हमारे लिए चाय लेकर आती हैं। चाय पीते हुए हम और जानकारी लेने लगते हैं।

मैं घर के बाहर बने छोटे मंदिर की ओर देखकर पूछता हूं कि यह मंदिर घर के बाहर क्यों बनाया गया है। इस इलाके में हमने पहले भी देखा था कि अधिकतर घरों के बाहर 7–8 फुट ऊंचा छोटा मंदिर बना होता है।

अब स्थानीय भाषा में गृहिणी बताती हैं, “ओ कुंएं वाले बाला जी गो मंदिर है, अर ओ घर गै बाहरै ई बनाइयो जावै है” (यह कुएँ वाले बालाजी का मंदिर Kuyen wale Bala ji Temple है। यह घर के बाहर ही बनाया जाता है)

हम चाय पी ही रहे होते हैं कि किसान और उनकी पत्नी हमें थोड़ी देर रुकने को कहकर बाल्टी उठाकर खेत की ओर चले जाते हैं। कुछ ही देर में वे अपने खेत की जैविक सब्जियों से भरी बाल्टी लेकर लौटते हैं। गृहिणी एक बड़े लिफाफे में सब्जियां भरकर हमें दे देती हैं।

अब हम अगले पड़ाव के लिए उठते हैं। विजय पाल जेब से पर्स निकालकर सब्जियों की कीमत पूछते हैं।

“आप हमारे मेहमान हो, आपसे पैसे कैसे ले सकता हूं,” किसान महेंद्र कुमार बहुत अपनत्व से कहते हैं।

हम मुफ्त में सब्जियां नहीं लेना चाहते थे, लेकिन उनकी आत्मीयता भी यही कह रही थी कि उनके सम्मान का मूल्य न लगाया जाए।

हम बीच का रास्ता निकालते हैं और पास खेल रहे उनके पोते को पैसे दे देते हैं। वे इसका भी विरोध करते हैं, लेकिन हम यह कहकर बात संभाल लेते हैं कि हमारे यहां बच्चों को उपहार देने की परंपरा है।

वे हमसे अगली बार खाटू श्याम Khatu Shyam ji आने पर जरूर मिलने आने का वादा लेकर हमें विदा करते हैं।

रास्ते में अलौदा गांव में हम ग्राम सेवा सहकारी समिति का कार्यालय भी देखते हैं, जहां किसानों को खाद आदि मिलती है। इसी तरह कोछोर गांव में एक और बालाजी का मंदिर देखने को मिलता है। रास्ते के गांवों में कुछ प्राचीन शैली के बने घर भी दिखाई देते हैं और एक किसान ऊंटगाड़ी पर गांव में सब्जियां बेचता हुआ भी नजर आता है।

लगभग सुबह 10 बजे हम जीण माता मंदिर के द्वार के पास पहुंच जाते हैं।

क्रमशः…

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