सफरनामे

धोरां रे प्रदेश की यात्रा – कैसे बना भटनेर से हनुमानगढ़

“अगर कोहरा हुआ तो 9 बजे चलेंगे, नहीं तो ठीक 6 बजे मैं तुम्हारे पास होऊँगा।”
मेरे दोस्त विजयपाल ने बात तय की।

लेखक के साथ उसका मित्र विजय पाल

“फिर सुबह उठकर कौन देखेगा कि कोहरा है या नहीं?”
मैंने अपने मन की उलझन बताई।

“चल, यह भी मैं ही देख लूँगा। तुम रज़ाई से बाहर मत निकलना।”
विजयपाल ने दूसरी पेशकश कर दी।

अचानक दिसंबर के आख़िरी हफ़्ते की शाम दोस्त विजय पाल से हुई बातचीत नए दिन की योजना के साथ पूरी हुई।

अगली सुबह कोहरा न था, और वादे के अनुसार पौने 6 बजे से ही विजयपाल मेरे घर पहुँच गए। मैं भी तैयार था। चाय के साथ पंजीरी खाकर हम गाड़ी लेकर राजस्थान की और निकल पड़े।

अभी काफ़ी अंधेरा था, लेकिन जब तक हम पंजाब–राजस्थान की सीमा के पास पहुँचे, तब तक भोर हो चुकी थी। अबोहर–हनुमानगढ़ रोड पर पड़ने वाले इस बॉर्डर पर पंजाब की तरफ़ आख़िरी गाँव राजपुरा है और राजस्थान की तरफ़ आख़िरी गाँव पतली। इसलिए इसे पंजाब की ओर “राजपुरा बॉर्डर” और राजस्थान की ओर “पतली बॉर्डर” कहा जाता है।

पंजाब वाले हिस्से में सड़क के किनारे गेहूँ के खेत और किन्नू के बाग थे। जैसे ही हम राजस्थान में दाख़िल हुए, खेती की स्थिति बदलने लगी। हालाँकि पंजाब की तरह राजस्थान के श्रीगंगानगर ज़िले में भी किन्नू के कई बाग हैं, लेकिन हनुमानगढ़ रोड पर इनकी संख्या काफ़ी कम है।

पतली बॉर्डर पार करते ही राजस्थान का पहला शहर सादुलशहर आता है। हालाँकि हमें शहर के भीतर नहीं जाना पड़ा, क्योंकि यह अबोहर–हनुमानगढ़ रोड से थोड़ा हटकर है। बीकानेर और श्रीगंगानगर ज़िलों में कई शहरों के नाम बीकानेर रियासत के शासकों के नाम पर रखे गए हैं। जैसे गंगानगर का नाम राजा गंगा सिंह के नाम पर और सादुलशहर का नाम उनके पुत्र सादुल सिंह के नाम पर पड़ा, जो 1943 में गंगा सिंह की मृत्यु के बाद बीकानेर के राजा बने थे।

राजस्थान का बड़ा भाग मरुस्थल है, लेकिन गंगा सिंह ने दूरदर्शी सोच के साथ यहाँ गंग नहर लाई, जिससे इस क्षेत्र को कृषि योग्य बनाया गया। आज यह नहर इस इलाके की जीवनरेखा बनी हुई है।

राजपुरा–पतली बॉर्डर से राजस्थान में प्रवेश करने पर पहले श्रीगंगानगर ज़िले का क्षेत्र आता है। खैरूवाला गाँव के पास टोल पार करने के बाद हनुमानगढ़ ज़िला शुरू होता है। 12 जुलाई 1994 को श्रीगंगानगर ज़िले से अलग करके हनुमानगढ़ को राजस्थान का 31वाँ ज़िला बनाया गया।

यह बताने से पहले कि हम कहाँ जा रहे हैं, हनुमानगढ़ के बारे में थोड़ी बात कर लेते हैं।
इस क्षेत्र का संबंध सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ता है। कालीबंगा में इस सभ्यता के अवशेष मिले हैं और वहाँ प्राप्त प्राचीन वस्तुओं का एक संग्रहालय भी है। यहाँ मिला हल इस बात का प्रमाण है कि लगभग 2500 वर्ष पहले भी इस इलाके में खेती होती थी। घग्गर नदी इस शहर के पास से गुजरती है। प्राचीन सभ्यताएँ प्रायः नदियों के किनारे ही विकसित हुई थीं।

यहाँ एक बहुत पुराना किला है, जिसे भटनेर दुर्ग कहा जाता है। कहा जाता है कि इसका निर्माण जैसलमेर के भाटी राजा के पुत्र भूपत ने 1295 ईस्वी में करवाया था। दिल्ली–मुल्तान मार्ग पर स्थित होने के कारण इस किले का बहुत महत्व था। 1805 में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने भाटियों को हराकर इस किले पर अधिकार कर लिया। जिस दिन यह विजय हुई, उस दिन मंगलवार और श्री हनुमान जी का दिन था, इसलिए इसका नाम बदलकर हनुमानगढ़ रख दिया गया।

गुरुद्वारा भाई सुक्खा सिंह भाई महताब सिंह

सिख इतिहास से भी इस शहर का नाम जुड़ा है। श्री दरबार साहिब को अपवित्र करने वाले मस्सा रंगड़ को दंड देने के बाद भाई सुखा सिंह और भाई महिताब सिंह, बुड़ा जोहड़ की ओर जाते समय एक रात यहाँ रुके थे। उनकी स्मृति में यहाँ एक गुरुद्वारा भी बना हुआ है।

हनुमानगढ़ को घग्गर नदी दो हिस्सों में बाँटती है। नदी के उत्तर वाले हिस्से को हनुमानगढ़ जंक्शन और दक्षिण वाले हिस्से को हनुमानगढ़ टाउन कहा जाता है। किला टाउन वाले हिस्से में है, इसलिए वही प्राचीन क्षेत्र है।

“जंक्शन और टाउन नाम कैसे पड़े?”
मैंने विजयपाल की ओर देखकर सवाल किया।

विजयपाल ने अंदाज़ा लगाते हुए कहा,
“टाउन तो पुराना शहर था ही। जब रेलवे लाइन बनी होगी, तो उन्होंने शहर का स्टेशन नदी के दूसरी ओर बना दिया होगा ताकि पुल वगैरह का खर्च बचे। उसी स्टेशन के कारण इसे जंक्शन कहा जाने लगा होगा। फिर जंक्शन के आसपास नए बाज़ार विकसित हुए होंगे और नया शहर बस गया होगा, जबकि पुराने को टाउन कहा जाने लगा होगा।”

विजयपाल का तर्क मानने योग्य था।

अब सड़क के किनारे गेहूँ के साथ-साथ सरसों के खेत भी बड़ी संख्या में दिखाई देने लगे। हनुमानगढ़ पार करके रावतसर के पास तो लगभग सभी खेत गेहूँ के ही नज़र आने लगे। यहाँ राजस्थान की दूसरी महत्वपूर्ण नहर, इंदिरा गांधी नहर (जिसे राजस्थान नहर भी कहते हैं) गुजरती है। इसके कारण रावतसर क्षेत्र में जलभराव (सेम) की समस्या भी देखने को मिलती है।

रावतसर पार करते हुए विजयपाल बोले,
“यार, चाय पी लें, कहीं गाड़ी रोक दें।”

मैंने कहा,
“कोई अच्छी जगह आएगी तो रोकते हैं।”

आगे एक होटल आ गया।
“यहीं ठीक है,” कहते हुए मैंने गाड़ी रोक दी।

हमने होटल वाले से दो कप चाय मँगवाई।
“कठ्ठे चाल्याओ, सरदार जी?”
होटल वाला स्थानीय बोली में पूछता है।

“सालासर जा रहे हैं,”
मैंने संक्षेप में जवाब दिया।

हमारे पूरे इलाके में सालासर में बने बालाजी के मंदिर की बहुत मान्यता है और आज हम वहीं जा रहे थे। गर्म चाय की चुस्कियों के साथ हम आसपास का नज़ारा देखने लगे, जहाँ ज़मीन में रेत की मात्रा बढ़ने लगी थी। रेत के धोरों की शुरुआत हो चुकी थी।

“चलो, अब गाड़ी मैं चलाता हूँ,”
चाय पीकर चलने लगे तो विजयपाल ने स्वयं ही ड्राइविंग की ज़िम्मेदारी ले ली और ड्राइवर सीट संभाल ली। अब मेरी नज़रें टीलों के नज़ारों को देखने के लिए और भी स्वतंत्र हो गईं।

और हाँ, अगली कड़ी तक अनुमति लेने से पहले एक और रोचक तथ्य बता दूँ।
राजस्थान के ज़िले आकार में बहुत बड़े होते हैं। हनुमानगढ़ ज़िले का क्षेत्रफल 9656 वर्ग किलोमीटर है। आसान भाषा में कहें तो इसका आकार पंजाब के कुल क्षेत्रफल का लगभग 20 प्रतिशत है। है न कमाल की बात!

चलो, बाकी बातें अगली कड़ी में।
चलता हूँ।

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