खाटू श्याम जी मंदिर
सालासर खाटू श्याम जी मंदिर यात्रा भाग 5
यहाँ (Khatu Shiyam ji) राज कुमार जी हमारी मुलाकात एक और घुमक्कड़ साथी मनप्रीत जी से करवाते हैं। मनप्रीत और रोहित भी राज कुमार जी के साथ ही सालासर आए थे। मनप्रीत द्वारा घर से लाई गई पिन्नियाँ खाकर चाय पीने के बाद मैं और विजय पाल Khatu Shiyam ji मंदिर जाने का निर्णय लेते हैं।

Khatu Shiyam ji Temple मंदिर के अंदर श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इस प्रकार बैरिकेडिंग की गई है कि 8–10 लाइनों में श्रद्धालु आगे बढ़ते हैं और प्रत्येक लाइन के बीच लोहे की पाइपों से बैरिकेडिंग की गई है। लगभग 200 मीटर लंबी लाइनों की शुरुआत से ही यह व्यवस्था शुरू हो जाती है। हम भी प्रसाद लेकर मुख्य द्वार की ओर से लाइनों में लग जाते हैं।
श्रद्धालु भजन-जाप कर रहे हैं और बीच-बीच में जयकारे भी लगा रहे हैं—
“एक दो तीन चार, बाबा तेरी जय जयकार”
“खाटू के श्याम की जय”
“कलियुग के अवतारी की जय”
“हारे के सहारे, बाबा श्याम हमारे।”
“खाटू श्याम Khatu Shiyam ji को ‘हारे का सहारा’ क्यों कहा जाता है?”
लाइन में मेरे आगे लगे विजय पाल से मैंने पूछा।
वे प्राचीन कथा का उल्लेख करते हुए बताने लगे,
“खाटू श्याम जी द्वापर युग में महाभारत Mahabharat काल के दौरान पांडव भीम के पौत्र थे। भीम Bheema के पुत्र थे घटोत्कच और घटोत्कच तथा मोरवी के पुत्र थे बर्बरीक। खाटू श्याम जी बर्बरीक Barbrik Story के ही कलियुग अवतार हैं। बर्बरीक को वरदान में तीन बाण प्राप्त थे, जिनके कारण उनकी वीरता का कोई मुकाबला नहीं था।

जब महाभारत Mahabharat का युद्ध होने वाला था, तब भारतवर्ष के सभी राजा पांडवों और कौरवों के पक्ष में बँटने लगे। जब बर्बरीक Barbrik की बारी आई, तो उन्होंने कहा कि वे उस पक्ष की ओर से युद्ध करेंगे जो हार रहा होगा। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा क्योंकि उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे कमजोर पक्ष का साथ देंगे। इसी कारण उन्हें ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है।”
Khatu Shiyam ji मंदिर दर्शन की लाइन में धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए मैंने फिर पूछा,
“तो क्या बर्बरीक ने महाभारत का युद्ध लड़ा?”
विजय पाल पुनः पौराणिक कथा सुनाने लगे,
“महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय के बीच था। यह द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध और अधर्मियों के नाश के लिए भगवान की लीला थी।”
वे आगे कहते हैं,
“भगवान श्रीकृष्ण Lord Sri Krishna यह जानते थे कि इस युद्ध में पराजय कौरवों की होगी और यदि बर्बरीक अपने वचन अनुसार हारने वाले पक्ष की ओर से युद्ध करेंगे, तो युद्ध का परिणाम बदल जाएगा। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण Lord Sri Krishna ब्राह्मण का वेश धारण कर बर्बरीक के पास गए और दान में उनका शीश माँग लिया। बर्बरीक Barbrik ने बिना संकोच अपना शीश भगवान को अर्पित कर दिया।”
शीश दान से पहले ब्राह्मण रूप में श्रीकृष्ण Lord Sri Krishna और बर्बरीक के बीच हुआ संवाद भी अत्यंत रोचक है। विजय पाल बताते हैं कि श्रीकृष्ण Lord Sri Krishna ने बर्बरीक से उनके बाणों की शक्ति के बारे में पूछा। बर्बरीक ने बताया कि उनका एक बाण ही पूरी सेना का नाश कर सकता है।
भगवान ने परीक्षा लेने हेतु कहा—
“मान लो सामने पीपल के पेड़ के पत्ते शत्रु सेना के सैनिक हैं, क्या तुम एक ही बाण से सभी पत्तों को भेद सकते हो?”
यह कहते हुए भगवान ने चुपचाप एक पत्ता अपने पैर के अंगूठे के नीचे छिपा लिया।
बर्बरीक Barbrik ने बाण चलाया और वह सभी पत्तों को भेदता हुआ भगवान के पैर के नीचे छिपे पत्ते तक पहुँचा और उनके अंगूठे को छू गया।
बर्बरीक Barbrik समझ गया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है। उसने भगवान से अपना वास्तविक रूप प्रकट करने को कहा। तब श्रीकृष्ण ने अपना दिव्य स्वरूप दिखाया और उनसे शीश दान माँगा।
बर्बरीक Barbrik ने एक इच्छा व्यक्त की कि वे महाभारत का युद्ध देखना चाहते हैं। भगवान ने वरदान दिया कि उनका कटा हुआ शीश जीवित रहेगा और वे सब कुछ देख-सुन सकेंगे। उनका शीश ऊँचे स्थान पर स्थापित किया गया, जिससे उन्होंने पूरा युद्ध देखा। युद्ध के बाद उनका शीश रूपवती नदी में प्रवाहित कर दिया गया। यह एक महान बलिदान की कथा है।

इसके पश्चात श्रीकृष्ण Lord Sri Krishna ने बर्बरीक Barbrik को वरदान दिया—
“कलियुग में तुम मेरे ‘श्याम’ नाम से पूजे जाओगे। तुम्हारे द्वार पर आने वाले भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी। जो भी निर्बल सहायता माँगने आएगा, तुम उसका सहारा बनोगे।”
भगवान के वरदान अनुसार बर्बरीक महाभारत के साक्षी बने और युद्ध के बाद उन्होंने ही गांधारी को बताया कि यह युद्ध पूर्णतः धर्मानुसार लड़ा गया था।
कुछ श्रद्धालु दंडवत प्रणाम करते हुए भी लाइन में आगे बढ़ रहे थे। अब हम मुख्य मंदिर के निकट पहुँच गए थे। बाहर फूलों की सुंदर सजावट दिखाई दे रही थी। श्रद्धालु एक द्वार से प्रवेश कर दूसरे द्वार से बाहर निकल रहे थे।
“यह मंदिर कब बना?”
मैंने अगला प्रश्न किया।
विजय पाल बताते हैं,
“कहा जाता है कि युद्ध के बाद बर्बरीक का शीश खाटू Khatu गाँव के एक तालाब में दबा रहा। कलियुग में खुदाई के दौरान वह प्राप्त हुआ। स्थानीय लोगों ने राजा को सूचना दी। तत्पश्चात सीकर Sikar रियासत के राजा रूप सिंह Raja Roop Singh ने मंदिर की स्थापना करवाई। माना जाता है कि पुराना मंदिर 17वीं शताब्दी में बना था, जबकि वर्तमान मंदिर का निर्माण लगभग 1779 ई. में हुआ।”
हम मंदिर के ठीक सामने पहुँच गए थे। सफेद संगमरमर से बना यह मंदिर अत्यंत भव्य लग रहा था। नक्काशीदार द्वारों के भीतर खाटू श्याम जी Khatu Shiyam ji की प्रतिमा विराजमान है। ऊपर विशाल गुंबद है—यह राजस्थानी वास्तुकला का श्रेष्ठ उदाहरण है।
हम कुछ क्षण रुककर नतमस्तक होते हैं। भारी भीड़ के कारण प्रबंधन लाउडस्पीकर द्वारा आगे बढ़ने की अपील कर रहा है। श्रद्धालु गुलाब के फूल अर्पित कर रहे हैं। वातावरण पूरी तरह भक्तिमय है।
दर्शन के बाद हम दूसरी ओर गली से बाहर निकलते हैं। विजय पाल कहते हैं कि अब श्री श्याम कुंड के दर्शन करने चलते हैं। मार्ग में बाजार सजे हुए हैं—प्रसाद, होटल, रेस्टोरेंट और कपड़ों की दुकानें। हर ओर श्रद्धालु ही श्रद्धालु हैं।

सामान्य दिनों में यहाँ प्रतिदिन लगभग 40–50 हजार श्रद्धालु आते हैं, परंतु फाल्गुन महीने में विशाल खाटू श्याम मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। कई लोग पैदल यात्रा करते हैं। उन दिनों सीकर Sikar जिले की सड़कों पर जगह-जगह लंगर लगाए जाते हैं। श्रद्धालु केसरिया ध्वज लेकर मंदिर पहुँचते हैं।
खाटू श्याम जी, सीकर Sikar से 55 किलोमीटर और जयपुर Jaipur से 70 किलोमीटर दूर स्थित हैं। सीकर और जयपुर सड़क, रेल और (जयपुर से) हवाई मार्ग से जुड़े हैं।
श्याम कुंड Shiyam Kund की ओर जाते हुए विजय पाल कथा आगे बढ़ाते हैं। वे बताते हैं कि युद्ध के बाद गांधारी Gandhari श्रीकृष्ण को अपने पुत्रों की मृत्यु का दोष देती हैं। तब श्रीकृष्ण उन्हें बर्बरीक के पास ले जाते हैं, जिन्होंने पूरा युद्ध देखा था।
बर्बरीक बताते हैं कि युद्ध में मारने वाला भी वासुदेव था और मरने वाला भी—सब कुछ भगवान की लीला थी। तब गांधारी को सत्य का बोध होता है।
शीघ्र ही हम श्याम कुंड पहुँचते हैं। माना जाता है कि यहीं खाटू श्याम जी Khatu Shiyam ji का शीश प्रकट हुआ था। यह लगभग 20–25 फीट गहरा अंडाकार कुंड है। लोग इसका पवित्र जल बोतलों में भरकर ले जाते हैं।
रात के साढ़े नौ बज चुके थे। भोजन के बाद हम अपने कमरे लौट आते हैं और अगली सुबह जीण माता मंदिर Jeen Mata Mandir जाने के निश्चय के साथ विश्राम करते हैं।
क्रमशः…
