सफरनामे

सालासर के मंदिरों के दर्शन

सालासर व खाटू शयाम धाम की यात्रा भाग 3

श्री अंजनी माता मंदिर सालासर

सालासर Salasar भले ही एक गाँव है, लेकिन आज यह एक शहर का रूप ले चुका है। सालासर Salasar में प्रवेश करते ही होटल और विभिन्न शहरों से आए श्रद्धालुओं द्वारा बनाई गई, होटलों जैसी सुविधाओं वाली धर्मशालाएँ दिखाई देने लगती हैं। बहुमंज़िला इमारतों के कारण इसका दृश्य बहुत सुंदर लगता है। हम सालासर Salasar से होकर गुजरने वाली सड़क के किनारे पार्किंग के लिए उपयुक्त स्थान देखकर अपनी गाड़ी पार्क कर देते हैं। दोपहर होने के कारण ठंड का असर पूरी तरह कम हो गया है। हम अपनी जैकेट उतार देते हैं। साथ ही एक पंडाल में एक प्रसिद्ध कथावाचक की श्री राम कथा चल रही है। सड़क पर वाहनों और पैदल आने-जाने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ है।

“हम पहले अंजनी माता के मंदिर चलेंगे,” विजय पाल ने बताया।
“ठीक है,” मैंने कहा और हम पास ही दिखाई दे रहे अंजनी माता के मंदिर की ओर चल पड़ते हैं।

मंदिर के सामने एक छोटा सा आँगन है और इसके चारों ओर दुकानों की कतार है, जहाँ से प्रसाद खरीदा जा सकता है। कुछ लोग इस आँगन तक भी अपने वाहन ले आए थे, जबकि यहाँ से मुख्य मंदिर तक जाने के लिए ऑटो भी सवारियाँ ले जाने के लिए खड़े हैं। हम एक दुकान से प्रसाद लेते हैं और अपने जूते उसी दुकान पर रखकर मंदिर के भीतर मत्था टेकने के लिए चले जाते हैं।

मुख्य मंदिर के भीतर सामने अंजनी माता की मूर्ति है। माता अंजनी श्री हनुमान जी की माता थीं। हम अपना प्रसाद पुजारी को देते हैं, वह उसका भोग लगाकर प्रसाद का कुछ हिस्सा हमें वापस घर ले जाने के लिए दे देता है। मूर्ति वाले गर्भगृह की परिक्रमा कर हम मंदिर के भीतर बने अन्य छोटे मंदिरों के दर्शन करते हैं और फिर बाहर आ जाते हैं।

अंजनी माता मंदिर के बिल्कुल पास ही श्री हनुमान जी के आराध्य श्री राम जी और माता सीता जी का श्री राम जानकी मंदिर Salasar सुशोभित है। हम यहाँ भी मत्था टेकते हैं। गर्भगृह में श्री राम जी, माता सीता और लक्ष्मण जी की मूर्तियाँ विराजमान हैं। मुख्य मंदिर के साथ ही शिव मंदिर Salasar है, जिसके सामने विशालकाय नंदी की प्रतिमा बनी हुई है।

यहाँ से हम सबके कल्याण की प्रार्थना करते हुए सालासर Salasar के मुख्य श्री बालाजी मंदिर के दर्शन के लिए चल पड़ते हैं। मुख्य मंदिर यहाँ से लगभग एक किलोमीटर दूर है। हम बाज़ार वाली गली से होकर वहाँ पहुँचते हैं। इस गली में खाने-पीने की दुकानों के अलावा अधिकतर दुकानें प्रसाद और धार्मिक वस्तुओं की हैं। जैसे-जैसे हम मुख्य मंदिर के पास पहुँचते हैं, भीड़ बढ़ती जाती है। अंजनी माता मंदिर की तुलना में मुख्य मंदिर के पास भीड़ काफ़ी अधिक है। यहाँ पंजाब, राजस्थान और हरियाणा से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

मुख्य मंदिर के चारों ओर प्रवेश के लिए कई गेट बनाए गए हैं। इनके पास बड़ी संख्या में प्रसाद की दुकानें हैं। दुकानदार प्रसाद देने के लिए आवाज़ें लगाते हैं—यही उनकी रोज़ी-रोटी है। हम नंबर तीन गेट से अंदर प्रवेश करते हैं। दुकान से लेने के बजाय हम मंदिर के प्रसाद काउंटर से प्रसाद लेते हैं और फिर मुख्य मंदिर में मत्था टेकने जाते हैं। अंदर सुंदर रंगोली से हनुमान जी की आकृति बनाई गई है। मंदिर में समिति द्वारा सुरक्षा व्यवस्था भी की गई है। सुनहरे बाहरी गेट से होकर भीतर कई कतारों में श्रद्धालु बालाजी की मूर्ति के दर्शन करते हुए मत्था टेकते हैं। गर्भगृह में श्री बालाजी की मूर्ति के साथ श्री रामचंद्र जी, माता सीता जी और लक्ष्मण जी की मूर्तियाँ भी विराजमान हैं। मंदिर की दीवारें स्वर्ण पत्रों से सजी हुई हैं। श्रद्धालु अपार श्रद्धा से बालाजी के आगे नतमस्तक होते हैं।

इसके बाद मंदिर के भीतर जल रहे धूणे में हम एक-एक नारियल अर्पित करते हैं। इस बड़े धूणे में श्रद्धालु लगातार नारियल डालते रहते हैं, जो निरंतर जलता रहता है। धुएँ की निकासी के लिए मंदिर समिति ने अच्छी व्यवस्था की हुई है।

लंगर का चूरमा

इसके बाद हम काहनी दादी जी और मोहनदास जी के स्थान के दर्शन करते हैं। कहा जाता है कि इन्हीं भाई-बहन को यहाँ मंदिर स्थापना के लिए दैवी आदेश मिला था। फिर हम मंदिर के भीतर बने भोजनालय में दोपहर का भोजन करते हैं। इसमें दाल, सब्ज़ी, रोटी के अलावा चूरमा विशेष रूप से इस स्थान की विशिष्ट पहचान के रूप में परोसा जाता है।

लोक परंपरा के अनुसार बताया जाता है कि यहाँ स्थापित बालाजी की मूर्ति 18वीं सदी में किसी अन्य गाँव में एक किसान को हल चलाते समय प्रकट हुई थी। पहले उसे उसी गाँव में स्थापित करने का विचार किया गया, लेकिन फिर मोहनदास को स्वप्न में आदेश हुआ कि इसे सालासर में स्थापित किया जाए। बैलगाड़ी से इसे सालासर लाया गया। इस स्थान पर पहुँचकर बैल रुक गए और श्री हनुमान जी के आदेश के अनुसार यहीं मंदिर की स्थापना की गई।

दोपहर के तीन बज चुके थे। हम अगली योजना बना ही रहे थे कि मेरे साथी राजकुमार का फोन आया। उसने बताया कि वे भी राजस्थान आए हुए हैं और आज सुबह ही सालासर धाम के दर्शन करने के बाद अब खाटू श्याम जी मंदिर पहुँच चुके हैं। यह सुनते ही मैं और विजय पाल सालासर से लौटने के बजाय खाटू श्याम जी धाम जाने का निर्णय कर लेते हैं।

“अभी दिन काफ़ी बाकी है, सूर्यास्त से पहले हम खाटू धाम पहुँच जाएंगे,” विजय पाल ने कहा।
“चलो फिर,” मैंने सहमति दी।

हम पार्किंग में आकर गाड़ी निकालते हैं। गूगल मैप पर रास्ता देखते हैं तो उसने दो मार्ग दिखाए—एक मुख्य सड़क वाला, जो सीकर होकर जाता है, और दूसरा लोकल की ओर नया रास्ता, जिस तरफ़ हम पहले कभी नहीं गए थे। हालाँकि सीकर वाला मार्ग हम जयपुर जाते समय कई बार जा चुके थे। इसलिए हम नया रास्ता चुनते हैं, यह सोचकर कि कुछ नया देखा जाए। गाड़ी अब इस नई सड़क पर दौड़ने लगती है।

जारी रहेगा।

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