पानी का मूल्य और राजस्थान
सालासर खाटू श्याम जी यात्रा भाग 4

राजस्थान Traveling in Rajasthan की यात्रा करते समय यह महसूस होता है कि पाँच नदियों वाले प्रदेश पंजाब Punjab के निवासी होने के कारण शायद हम पानी का सही मूल्य नहीं पहचानते। पानी का वास्तविक महत्व तो रेगिस्तान Desert में जाकर ही समझ में आता है।
सालासर Salasar क्षेत्र में पानी के संरक्षण से जुड़े प्राचीन और आधुनिक वर्षा जल संचयन Water Harvesting के तरीके देखने को मिले। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, प्राचीन काल में गाँव पानी के स्रोतों के पास बसाए जाते थे और इन स्रोतों में वर्षा का पानी Rain Water एकत्र किया जाता था। जहाँ प्राकृतिक रूप से भूमि आसपास से नीची होती और ढलान उस ओर होती, वहाँ वर्षा का पानी स्वतः एकत्र हो जाता था। जिस क्षेत्र से पानी बहकर आता था, उस कैचमेंट एरिया में लोग बरसात से पहले सामूहिक श्रम द्वारा सफाई करते थे और पशुओं का गोबर या अन्य गंदगी हटा दी जाती थी, ताकि साफ पानी जल भंडार में पहुँचे और पूरे वर्ष या अकाल की स्थिति में एक वर्ष से अधिक समय तक उपयोग किया जा सके।
सालासर क्षेत्र में इसी सिद्धांत पर कुछ बड़े पक्के तालाब (डिग्गियाँ) बने हुए दिखाई दिए, जिनका निर्माण मनरेगा MGNREGA की सहायता से किया गया था। इनका आकार लगभग 100 फीट × 100 फीट था। इन्हें सामुदायिक जल संचयन संरचना कहा जा सकता है, जहाँ आसपास के लोग और वन्य जीव भी पानी पी सकते हैं।
इस क्षेत्र में निजी उपयोग के लिए बनी डिग्गियाँ भी देखने को मिलती हैं। सालासर Salasar से नेवचा Nevcha जाते समय हम ऐसी ही एक डिग्गी देखकर रुक गए और सड़क किनारे बनी एक ढाणी की ओर गए। वहाँ एक युवक और उसकी माँ रहते थे। घर में पक्की ईंटों से बने दो कमरे थे, जिन पर प्लास्टर नहीं था। बकरियों और गाय के लिए एक छप्पर भी बना हुआ था।

मैंने युवक से कहा, “हम पंजाब Punjab से हैं और राजस्थान Rajasthan घूमने Traveling आए हैं। इस डिग्गी के बारे में जानकारी लेना चाहते थे, इसलिए आपके पास आए हैं।”
वह हमें इशारे से डिग्गी की ओर ले गया। तब तक उसकी माँ भी आ गई।
डिग्गी की बनावट की बात करें तो इसके केंद्र में लगभग 20 फीट गहरी और 15 फीट व्यास वाली पक्की कुण्डी बनाई जाती है, जिसकी छत जमीन से लगभग 2–2.5 फीट ऊँची होती है। इसके चारों ओर गोलाकार में लगभग 10–12 फीट तक पक्का क्षेत्र बनाया जाता है। डिग्गी की छत और आसपास पक्के क्षेत्र पर गिरने वाला पूरा वर्षा जल जालीदार नालियों के माध्यम से डिग्गी में चला जाता है। इस प्रकार एक परिवार के लिए लगभग एक वर्ष का पीने का पानी इसमें संग्रहित हो जाता है।
विजय पाल ने पूछा, “क्या पानी खराब नहीं होता?”
युवक ने पास रखे घड़े से लोटा भरकर पानी देते हुए कहा, “पीकर देखिए।”
हमने पानी पिया। पानी पूरी तरह साफ था। विजय पाल ने ढक्कन उठाकर भी संतुष्टि कर ली। डिग्गी में अभी भी आधे से अधिक पानी भरा हुआ था।

युवक की सरल स्वभाव वाली माँ बताने लगी, “यह सरपंच ने बनवाकर दी है। हमने उसे वोट दिया था।” वह शायद यह नहीं जानती थी कि यह उसका अधिकार है, लेकिन उसके मन में सरपंच के प्रति गहरा आभार था। संभवतः सिर पर घड़े उठाकर दूर से पानी लाने की मजबूरी से मुक्ति मिलने के कारण यह डिग्गी उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
इस क्षेत्र में खेती बहुत कम थी, लेकिन कहीं-कहीं हरे-भरे खेत दिखाई देते थे, जहाँ मुख्य रूप से गेहूँ और सरसों की फसल थी। उसकी ढाणी के पास खाली खेत देखकर मैंने पूछा कि बुवाई क्यों नहीं की।
युवक ने सड़क की ओर इशारा करते हुए बताया, “चाचा के साथ हमारा ट्यूबवेल साझा था। सड़क नई बनी तो पाइप टूट गई, इसलिए इस साल रबी की फसल नहीं बोई।”
सड़क के दूसरी ओर उसके चाचा के खेतों में गेहूँ की फसल खड़ी थी, जहाँ स्प्रिंकलर सिस्टम Sprinkler System से पहली सिंचाई हो रही थी।
विजय पाल ने फिर पूछा, “इस साल घर कैसे चलेगा?”
युवक की माँ ने बड़े धैर्य से जवाब दिया, “दो गायें हैं, एक ने अभी बछड़ा दिया है, दूध बेचते हैं। 5–7 बकरियाँ हैं। लड़के का पिता शहर में मजदूरी करता है। गुज़ारा हो जाता है।”
युवक बोला, “पाइप ठीक हो जाएगी तो अगले साल बुवाई करेंगे।” उसका खेत लगभग 2–3 एकड़ का था, जो खाली पड़ा था। हालांकि पिछली बरसात में हुई बाजरे Bajra Crop की फसल के डंठल उन्होंने सर्दियों में पशुओं के लिए संभाल कर रखे थे।

युवक की माँ खुले में कमरे के आगे बने चूल्हे की ओर चाय बनाने बढ़ी, लेकिन हमने विनम्रतापूर्वक मना किया, क्योंकि हमें रात से पहले खाटू श्याम मंदिर Khatu Shiyam Temple पहुँचना था।
लोसल Losal शहर से गुजरते हुए हमने अगले गाँव के पास जमीन के ऊपर कमरे के आकार की बनी एक टंकी देखी। स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि इसमें दूर से पाइप द्वारा पानी आता है। इसके साथ एक नांद बनी थी, जहाँ पशु पानी पी सकते थे और लगी हुई टोंटियों से गाँव की महिलाएँ घड़ों में पानी भरकर ले जाती थीं।
राजस्थान के इस रेगिस्तानी क्षेत्र में सर्दियों में बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। इसलिए गाँवों के पुरुष पर्यटन उद्योग में काम करने शहरों की ओर चले जाते हैं।
रास्ते में लोसल Losal नाम का शहर आता है, जिसका मुख्य बाज़ार शहर से गुजरती सड़क पर ही था। राजस्थान के शहर खुले और विस्तृत हैं, और सड़कों की चौड़ाई काफी अधिक है।
सालासर से खाटू श्याम जाते हुए जिस सड़क पर हम चल रहे थे, वह एक स्टेट हाईवे था। राज्य सरकार ने टोल लगाया हुआ है। सड़क की हालत अच्छी थी, लेकिन दुख इस बात का था कि स्टेट हाईवे State Highway पर हमारा 3000 रुपये वाला वार्षिक फास्टैग Fastag पास मान्य नहीं था। फिर भी संतोष था कि सड़क बहुत साफ थी।


रास्ते में लालास Lalaas नामक गाँव में श्री हनुमान जी Sri Hanuman Temple का एक भव्य मंदिर दिखाई दिया। समय की कमी के कारण हम बाहर से ही नमन कर आगे बढ़ गए, लेकिन इसकी वास्तुकला विशेष रूप से आकर्षक थी।
आगे खूड कस्बा, फिर दांता Danta और एक अजीब नाम वाले गाँव ‘बाए’ से गुजरते हुए हम खाटू श्याम Khatu Shiyam की ओर बढ़ते गए। खाटू श्याम Khatu Shiyam के पास खेती की सघनता काफी बढ़ गई थी। अधिकतर गेहूँ और जौ की खेती थी, जो पूरी तरह स्प्रिंकलर सिस्टम पर निर्भर थी। रास्ते में एक ऊँची पहाड़ी पर एक पुराना किला भी दिखाई देता है, लेकिन उसके इतिहास के बारे में बताने वाला कोई नहीं था। कभी उसे देखने का अवसर अवश्य मिलेगा।
सूर्यास्त के समय, जब सूरज पश्चिम दिशा में ढल चुका था, हम खाटू श्याम जी पहुँच गए। पार्किंग गेट पर ही मेरे साथी राज कुमार Raj Kumar DPRO हमारा इंतज़ार कर रहे थे। हमारे पहुँचने से पहले ही उन्होंने हमारे ठहरने की व्यवस्था कर ली थी।
