प्राचीन चोमुखा महादेव मंदिर
हम जिस सड़क पर जा रहे थे, वह हिमाचल प्रदेश Himachal Pradesh के Amb अंब शहर से नादौन Nadaun की ओर जाती है। बहुत अधिक ट्रैफिक नहीं था। सड़क के आस-पास पहाड़ियां थीं और साथ-साथ ब्यास नदी Beas River बह रही थी। वही ब्यास, जिसका प्राचीन शास्त्रों में नाम विपाशा नदी लिखा मिलता है।

वेद-शास्त्रों के अनुसार प्राचीन समय में ब्यास यहाँ एक द्वीप बनाती थी, जिस पर केवल राक्षस ही रहते थे। उस समय ब्यास नदी का पानी इस द्वीप के दोनों ओर बहता था। यहाँ देवताओं और राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध होते रहते थे। राक्षसों के अत्याचारों के कारण यहाँ से गुजरने वाले ऋषि-मुनि दुःखी रहते थे। इसलिए दुःखी होकर ऋषि-मुनि वैकुण्ठ धाम में भगवान विष्णु जी Lord Vishnu की शरण में गए। फिर भगवान विष्णु जी को साथ लेकर ऋषि-मुनि कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर जी Lord Shiva के पास इस विपत्ति का कोई उपाय करने की प्रार्थना लेकर पहुँचे।
कहा जाता है कि भगवान शंकर जी ने चतुर्मुख-अष्टभुज रूप धारण करके पांडवों से कालिधार कैलाश पर्वत से राक्षसों को मारने के लिए चार तीर चलवाए। जब वे तीर राक्षसों को लगे, तो वे खैरन-खड्ड के पास दंत-वलडाह नामक स्थान पर जाकर गिर पड़े और उन्होंने प्राण त्याग दिए।
इसके बाद पांडवों ने यहाँ निवास करके मंदिर बनाया। फिर भगवान शंकर जी चतुर्मुख-अष्टभुज रूप धारण करके राक्षसों के स्थूल शरीर का त्याग कराकर मंदिर में विराजमान हुए। तभी से यह स्थान चोमुखा महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
यह सब हमें तब पढ़ने को मिला जब हम सड़क किनारे बने प्राचीन चोमुखा महादेव मंदिर Ancient Chaumukha Mahadev Temple में प्रवेश करके भगवान शिव के दर पर पहुँचे। मंदिर के अंदर भगवान शिव की चार मुखों वाली प्रतिमा स्थापित है और बाहर नंदी विराजमान हैं। प्रकृति की गोद में बने इस मंदिर में अद्भुत शांति थी और साथ बहती ब्यास नदी का कल-कल स्वर इसे और भी आध्यात्मिक बना रहा था।

हमने मंदिर में माथा टेकने के बाद यहाँ के पुजारी से प्राचीन तीरों के बारे में और जानकारी लेनी शुरू की।
पुजारी कथा आगे बढ़ाते हैं—
हिमाचल देवभूमि है। मंदिर में “ॐ नमः शिवाय” का जाप किया जाता है, जिससे पापों से मुक्ति मिलती है और हर प्रकार के दुःखों का नाश होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
“बोलो चोमुखा महादेव की जय”
हमने भी उनके साथ “चोमुखा महादेव की जय” बोला।
पुजारी जी ने बताया कि यहाँ पांडवों द्वारा चलाए गए चार तीर मौजूद हैं। आश्चर्य की बात यह है कि उनमें से तीन तीर साबुत (पूरे) हैं और एक तीर आधा है। उन्होंने बताया कि यह स्थान नादौन (जिसका पुराना नाम अमतर था) के राजा के अधीन था।
राजा को इन चार तीरों के बारे में ऋषि-मुनियों से पता चला। तब उसने पहले अपने सैनिकों को चोमुखा महादेव मंदिर में भेजा कि जाकर जांच करो कि पांडवों द्वारा चलाए गए चार तीर वास्तव में मौजूद हैं या नहीं।
सैनिकों ने चारों तीरों को ढूंढकर राजा को बताया कि वहाँ चार तीर मौजूद हैं। इसके बाद राजा हाथियों, घोड़ों और सैनिकों के साथ स्वयं उन तीरों को देखने के लिए चोमुखा महादेव जी के मंदिर की ओर रवाना हुआ। यहाँ आकर उसने इन तीरों की शक्ति परखने की गलती की, जिसके बाद एक तीर खंडित हो गया।

आज भी मंदिर के चारों कोनों पर ये पत्थर और तीर लगे हुए हैं, जिनमें से तीन पूरे हैं और एक खंडित है।
मैं सोचने लगा कि सत्ता का नशा भी कितनी अजीब चीज़ है—वह भगवान शिव के तीरों की शक्ति परखने लग पड़ा। तभी मेरी पत्नी ने कहा, “ये राक्षस अब कहाँ चले गए?”
मैंने कहा, “राक्षस कहीं नहीं गए, वे मनुष्यों के भीतर ही छिपे हुए हैं। थोड़ा-थोड़ा राक्षस तो हर इंसान के अंदर होता है। जब तक मनुष्य अपने दैवी गुणों से उसे दबाए रखता है, वह सुप्त रहता है, और जैसे ही दैवी गुण कमजोर पड़ते हैं, वह प्रकट हो जाता है। समाज के अपराध यही राक्षस करते हैं। इसलिए जरूरी है कि आध्यात्म, परिवार के अच्छे संस्कार और धर्म की शक्ति से मनुष्य के दैवी गुण मजबूत बने रहें—इसी में समाज और मानवता की भलाई है।”
हमने कुछ समय इस शांत स्थान पर भगवान शिव के इस मंदिर में बिताने के बाद अपने अगले सफर के लिए प्रस्थान किया, जो कि हमारा अगला पड़ाव गुरुद्वारा दसवीं पातशाही नादौन था।
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