देश के पहले हैरिटेज गांवों की यात्रा
फरवरी महीने के आख़िरी वीकेंड पर हम Himachal Pradesh के हैरिटेज गांवों Heritage Villages परागपुर Pragpur और गरली Garali जाने के लिए निकले। इन दोनों को देश के पहले हैरिटेज First Heritage Village of India गांव होने का गौरव प्राप्त है। मेरे साथ बाईं सीट पर मेरी पत्नी बैठी थी।

सुबह की नरम धूप तलवाड़ा Talwara के पेड़ों की पत्तियों से छनकर कार के शीशों पर दस्तक दे रही थी। मैंने स्टीयरिंग संभाला और मेरी पत्नी ने म्यूज़िक सिस्टम पर कोई मधुर-सा संगीत चला दिया। हम पंजाब को हिमाचल से जोड़ने वाली सड़क से दौलतपुर चौक Daoulatpur Chauk नाम के शहर की ओर जा रहे थे। हमारे बाईं ओर हिमाचल की पहाड़ियाँ थीं और हमारी सड़क के दाईं ओर दौलतपुर से बरास्ता तलवाड़ा मुकैरियां तक बन रही नई रेलवे लाइन New Rail Link Between Daulatpur Chauk and Mukerian चल रही थी। इसका काम आख़िरी चरण में है और उम्मीद है कि एक साल के भीतर यह नया रेल लिंक शुरू हो जाएगा। इससे चंडीगढ़ और दिल्ली Delhi से पठानकोट और जम्मू Jammu जाने के लिए एक वैकल्पिक रेल मार्ग उपलब्ध होगा और साथ ही इस इलाके की पर्यटन इंडस्ट्री को भी बढ़ावा मिलेगा।
जब हम दौलतपुर चौक से गुज़रे तो कुछ ही दुकानें खुली हुई थीं। यहां से हम मुबारकपुर Mubarakpur की ओर निकल गए। मुबारकपुर के बाज़ार की मुख्य गली से गुजरते हुए एक चौक पार करके हम अंब Amb शहर की सड़क पर आ जाते हैं। इधर डेरा वडभाग सिंह Dera Vadbhag Singh होने के कारण बहुत सी संगत ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में जा रही थी। नौजवान मोटरसाइकिलों पर भी जा रहे थे। अंब शहर के बाज़ारों में दिन की चहल-पहल शुरू होने से पहले ही हम इसे भी पार करके यहां से नादौन Amb Nadaun Road जाने वाली पहाड़ी सड़क पर मुड़ गए।
रास्ते में कई पहाड़ी नाले आए, जिनमें इस समय सूखे मौसम के कारण पानी लगभग ना के बराबर था। दौलतपुर से तलवाड़ा की ओर जितने भी ऐसे पहाड़ी नाले आते हैं उनका पानी पोंग डैम Pong Dam की तरफ़ जाकर पोंग डैम के आगे ब्यास Beas River नदी में मिल जाता है। वहीं दौलतपुर से अंब की ओर आने वाले पहाड़ी नालों का पानी नंगल डैम Bhakra Dam से डाउनस्ट्रीम सतलुज Sutlej River नदी में जाकर मिलता है।

इस सड़क पर बहुत तीखी चढ़ाई नहीं थी और कुछ को छोड़कर ज़्यादा तीखे मोड़ भी नहीं थे। जैसे-जैसे हम हिमाचल के अंदर जा रहे थे, इसकी हवा में एक अलग ताज़गी महसूस होने लगी। पहाड़ों के बीच से गुजरते हुए ऐसा लग रहा था जैसे पहाड़ हमें अपनी बाहों में लेने के लिए तैयार हों।
“जब भी हम कोई मोड़ मुड़ते हैं, लगता है कि हर मोड़ पर कोई नया दृश्य हमारा इंतज़ार कर रहा है,” मेरी पत्नी ने कहा।
मैंने कहा, “बिलकुल! सफ़र का मज़ा मंज़िल से ज़्यादा इन रास्तों में ही होता है। ज़रा देखो, ये पहाड़ियाँ और इनकी ढलानें जैसे प्रकृति की किसी कविता जैसी लगती हैं।”
इस मुख्य सड़क से हम क्लोहा गाँव Kaloha Village के पास एक बरसाती नाला पार करके बाईं ओर एक लिंक सड़क पर मुड़ जाते हैं। यही सड़क हमें परागपुर Pragpur और गरली Garali ले जाने वाली थी। अब सड़क थोड़ी संकरी हो गई थी, लेकिन प्रकृति अब और भी करीब आ गई थी।
जब हम भारत के पहले विरासत गाँव परागपुर Pragpur, First Heritage Village of India में दाख़िल हुए तो ऐसा लगा जैसे हम 19वीं सदी के किसी यूरोपीय कस्बे में आ गए हों। पत्थरों से बनी गलियाँ (Cobblestone streets) और दशकों पुरानी हवेलियों ने हमारा स्वागत किया। गाँव में ढलानदार छतें और लकड़ी के काम वाले झरोखे आज भी बीते समय की कहानियाँ सुनाते प्रतीत होते हैं। कार पार्क करके जब हम पैदल चले तो पत्थरों की छुअन मन को सुकून दे रही थी।

मेरी पत्नी ने हैरानी से हवेलियों के झरोखों को देखते हुए कहा, “आज के सीमेंट के जंगलों में यह खूबसूरती कहाँ?”
मैंने समझाते हुए कहा, “यह ‘जजों की कोठी’ और यहाँ का बाज़ार… ये सब इतिहास की जीवित मिसालें हैं। यहाँ समय की रफ्तार शायद दुनिया से थोड़ी धीमी है, इसलिए यहाँ इतनी शांति है।”
हम गाँव के बीच बने एक तालाब के पास पहुँचते हैं, जिसके साथ ही एक ओर नायब तहसीलदार का दफ़्तर था। यहाँ चारों ओर पुराने घर दिखाई देते हैं। रस्ते में हम इस गांव में बने पुरातन मंदिर के दर्शन करते है. यहाँ से हम बाज़ार से होते हुए बाहर सड़क पर आते हैं और अपनी कार के पास पहुँच जाते हैं। फिर हम गरली गाँव Garali Village of Himachal Pradesh की ओर चल पड़ते हैं।
यहाँ से एक खड्ड (पहाड़ी नाला) पार करके हम गरली गांव की तरफ़ मुड़ जाते हैं। इस इलाके की इन खड्डों (पहाड़ी नालों) का पानी पास ही बहने वाली ब्यास नदी में जाता है। गरली के स्कूल के पास स्थित “नौरंग यात्री निवास” Naurang Yatri Niwas नाम की एक विरासत इमारत के पास हम रुकते हैं। यहाँ अब एक होटल है। होटल का स्टाफ हमें बड़े उत्साह से यह इमारत दिखाता है। इसे विरासत के रूप में बहुत संभालकर रखा गया है। पुराने समय में यह एक सराय हुआ करती थी जहाँ यात्री ठहरते थे।
हम यहाँ नाश्ता करते हैं। गरली ने अपनी अनोखी वास्तुकला से हमें मंत्रमुग्ध कर लिया था। यहाँ के घरों में इटालियन (Italianate) और गॉथिक शैली का अनोखा मेल देखकर आँखें हैरान रह गईं। गरली सिर्फ़ एक गाँव नहीं, बल्कि एक खुला संग्रहालय है।
जब हम घर से चले थे तो हमारा लक्ष्य सिर्फ़ ये दो गाँव देखना ही था। लेकिन यहाँ गरली में हाथों से बने सामान की एक दुकान पर सामान बेच रही लड़कियों ने हमें अपनी यात्रा आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। हम दोनों एक-दूसरे की ओर देखते हैं और आगे बढ़ने का फैसला कर लेते हैं।
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