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छोटा घल्लूघारा – काहनूवाल छंब

गुरदासपुर ज़िले की यात्रा : भाग 1

एक ठंडी सर्द सुबह हम मुकेरियां से Gurdaspur जाने वाली सड़क पर जा रहे थे। धुंध के कारण दूर तक कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था। सड़क पर कारों, ट्रकों और बसों के अलावा गन्ने की फसल बेचने के लिए शुगर मिल की ओर जा रहे किसानों की ट्रालियां धीरे-धीरे चलती हुई हमारे पास से गुजर रही थीं। सड़क के किनारे खेतों में गेहूं और गन्ने की फसल लहलहा रही थी। हम ब्यास नदी Beas River का पुल पार करके गुरदासपुर जिले Gurdaspur District में प्रवेश कर चुके थे।

मेरे साथ सफर कर रही मेरी पत्नी ने बात शुरू की,
“आज हम जहां जा रहे हैं, उसके बारे में कुछ बताओ तो।”

मैंने कहा, “अच्छा सुनो।”

“18वीं सदी के लगभग साढ़े चार दशक बीत चुके थे। उस समय सिख पंथ Sikh Panth बहुत कठिन दौर से गुजर रहा था। सिखों के सिरों पर इनाम रखे जा रहे थे। मुगल हुकूमत Mugal Empyre सिखों के खून की प्यासी थी। इसी दौर में 1 जुलाई 1745 को लाहौर Lahore और मुल्तान Multan के मुगल गवर्नर जकरिया खान Zakriya Khan की मृत्यु हो गई। इसके बाद लगभग छह महीने तक किसी को गवर्नर नहीं बनाया गया। फिर 1746 की शुरुआत में जकरिया खान के बड़े बेटे याहिया खान Yahiya Khan को लाहौर और छोटे बेटे शाह नवाज़ खान को मुल्तान का डिप्टी गवर्नर बनाया गया।

याहिया खान का दीवान लखपत राय था और उसके भाई जसपत राय Jaspat Rai को मुगलों ने एमनाबाद Emnabad का फौजदार बनाया हुआ था। वह अपने मुगल आकाओं को खुश करने के लिए सिखों को मारने के लिए हमेशा उतावला रहता था।” धुंध के कारण एक ट्रक को पार करते समय मैंने कुछ देर सड़क पर ध्यान दिया और फिर अपनी बात आगे बढ़ाई।

“ऐसे ही कठिन समय में रोड़ी साहिब के गुरुद्वारा साहिब में इलाके के सिख 1746 की वैसाखी मनाने के लिए एकत्र हुए थे। सिख यहां शांतिपूर्ण ढंग से अपना स्थापना दिवस मना रहे थे कि अचानक एमनाबाद के फौजदार जसपत राय की फौजी टुकड़ी ने उन पर हमला कर दिया,” मैंने आगे कहा —

“‘भै काहू कउ देत नहि, नहि भै मानत आन।’
गुरुवाणी की इस शिक्षा पर चलने वाले सिख पहले किसी पर हमला नहीं करते, लेकिन यदि कोई उन पर हमला कर दे तो वे पीछे भी नहीं हटते। सिखों ने बहादुरी से मुगलों की उस टुकड़ी का मुकाबला किया और इस लड़ाई में फौजदार जसपत राय मारा गया।”

मेरी कार की गति धीमी थी और धुंध अभी भी छाई हुई थी। मैं अपनी बात आगे जारी रखते हुए कहने लगता हूँ, “जब यह खबर उसके भाई लखपत राय Lakhpat Rai को मिली, जो लाहौर के डिप्टी गवर्नर याहिया खान का दीवान था, तो वह सिखों के खून का प्यासा हो गया। उसने याहिया खान को सिखों के खिलाफ भड़काया और सिखों पर अत्याचार शुरू कर दिए। लाहौर में जितने भी सिख परिवार थे, उन्हें पकड़कर शहीद कर दिया गया। सिख जंगलों की ओर निकल गए और मुगल सेनाएं उनका पीछा करने लगीं।”

मैंने आगे बताया, “लगभग 15 हजार सिखों का एक जत्था इस इलाके के जंगलों में आ गया जिसे छंब Kahnuwal Chhamb कहा जाता था। ब्यास और रावी नदियों के बीच का क्षेत्र होने के कारण यहां उस समय घना जंगल था, जहां सिख शरण ले सकते थे। सिखों के लिए यह क्षेत्र वन दुर्ग बन गया”

मेरी पत्नी ने धीरे से कहा,
“यह सचमुच बहुत कठिन समय रहा होगा। हमारी कौम ने बहुत तूफान झेले हैं।”

मैंने गुरदासपुर Gurdaspur से थोड़ा पहले कार को सड़क से मुड़ती एक लिंक रोड पर मोड़ते हुए कहा,
“हाँ, बिल्कुल।”

“फिर क्या हुआ?” उसने उत्सुकता से पूछा।

मैंने आगे बताया,
“सिख गुरिल्ला युद्ध में माहिर थे। वे जंगलों से निकलकर मुगल सेना से मुकाबला कर रहे थे। जब मुगलों को सफलता नहीं मिली तो याहिया खान Yahiya Khan ने जंगल कटवाने का आदेश दे दिया ताकि सिखों की छिपने की जगह खत्म हो जाए। उस समय मई का महीना था और गर्मी भी बहुत थी। सिखों ने रावी नदी Ravi River पार करके पहाड़ों की ओर जाने का निर्णय लिया। लेकिन जब वे कठुआ Kathua की ओर बढ़े तो पहाड़ी राजाओं ने उन पर हमला कर दिया, क्योंकि वे मुगलों की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। मजबूर होकर सिखों को वापस लौटना पड़ा।”

मेरी पत्नी बोली,
“यानि मुगलों के साथ-साथ अपने लोग भी दुश्मन बने हुए थे।”

मैंने कहा,
“हाँ, कहानी कुछ ऐसी ही थी।”

इतने में धुंध थोड़ी कम होने लगी और दूर से हमें छोटा घल्लूघारा स्मारक काहनूवाल छंब Chhota Ghalughara Memorial, Kahnuwal Chhamb का शहीदी बुर्ज दिखाई देने लगा। मेरी पत्नी ने दूर से ही हाथ जोड़कर उस स्थान को नमन किया और कहा,
“हम Chhota Ghalughara Memorial, Kahnuwal Chhamb स्मारक के पास पहुंच गए।”

कुछ ही देर में हमने कार पार्किंग में खड़ी की और Chhota Ghalughara Memorial, Kahnuwal Chhamb स्मारक के अंदर प्रवेश किया।

पंजाब सरकार द्वारा बनाए गए इस Chhota Ghalughara Memorial, Kahnuwal Chhamb स्मारक के मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही दोनों तरफ गैलरियां हैं। एक तरफ तस्वीरों के माध्यम से और दूसरी तरफ ऑडियो-विजुअल तकनीक के जरिए इस स्थान का इतिहास दर्शाया गया है।

हम सबसे पहले सामने बने शहीदी बुर्ज के पास पहुंचे और वहां शहीद हुए हजारों सिखों को श्रद्धांजलि दी। हरियाली से घिरे वातावरण में खड़ा यह बुर्ज उन हजारों शहादतों की गवाही देता हुआ प्रतीत होता है जिन्होंने अपने धर्म और स्वतंत्रता के लिए बलिदान दिया।

बुर्ज के चारों ओर उस समय का इतिहास मूर्तियों के रूप में दर्शाया गया है। कहीं मुगल सैनिक निहत्थे बच्चों और महिलाओं पर हमला करते दिखाई देते हैं, तो कहीं बहादुर सिख मुगलों का डटकर मुकाबला करते हुए नजर आते हैं।

चारों ओर गुरबाणी की मधुर ध्वनि गूंज रही थी। हम कुछ देर मौन बैठकर उन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते रहे।

इसके बाद हम चित्र गैलरी की ओर गए। वहां इस पूरे इतिहास को प्रभावशाली चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है। उन्हें देखते-देखते ऐसा लगता था मानो हम स्वयं इतिहास के उसी दौर में पहुंच गए हों।

गैलरी में हमें यह भी पढ़ने को मिला कि इस जत्थे का नेतृत्व करने वालों में
सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया Sardar Jassa Singh Aahluwalia, सुखा सिंह माड़ी कम्बो, हरी सिंह, चढ़त सिंह सुकरचक्किया, कपूर सिंह और दीप सिंह जैसे वीर शामिल थे।

गैलरी देखने के बाद हम बाहर आए और थोड़ी दूर स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब के दर्शन किए। यहां पुराना गुरुद्वारा भी है और एक नई इमारत भी बन रही है।

गुरुद्वारे से प्रसाद लेकर बाहर निकलते समय मेरी पत्नी ने पूछा,
“इस घल्लूघारे में कितने लोग शहीद हुए होंगे?”

मैंने कहा, “घल्लूघारा का अर्थ ही होता है बहुत बड़े पैमाने पर हुआ नरसंहार। कहा जाता है कि यहां लगभग 7-8 हजार सिख, सिखनियां और बच्चे शहीद हुए थे और करीब 3 हजार लोगों को मुगल कैद करके लाहौर ले गए थे, जहां उन्हें भी मार दिया गया।”

मैंने आगे बताया, “यह भी कहा जाता है कि इस संघर्ष की शुरुआत में लगभग 15 हजार लोग इस जत्थे में थे। लेकिन अंत में केवल करीब 2 हजार लोग ही ब्यास नदी पार करके मालवा Malwa Belt of Punjab की ओर निकलने में सफल हो पाए। कुछ लोग पहाड़ी रास्तों से होते हुए कीरतपुर साहिब Kiratpur Sahib की ओर भी पहुंच गए थे।”

मेरी पत्नी ने भावुक होकर कहा, “हमारे पूर्वजों ने अपने धर्म और देश की रक्षा के लिए कितनी बड़ी कुर्बानियां दी हैं। हर व्यक्ति को यह स्थान देखने जरूर आना चाहिए, क्योंकि हमारे आज की जड़ें हमारे इतिहास Sikh History में ही हैं।”

इतने में हम मुख्य सड़क पर आ गए थे।

हमारी आज की यात्रा का पहला पड़ाव पूरा हो चुका था। अब हमें बटाला जाना था, जहां मेरे मित्र इंदरजीत सिंह बाजवा हमारा इंतजार कर रहे थे।

-भूपिंदर सिंह बराड़

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