धार्मिक स्थलसफरनामे

पंचम तीर्थ — श्री कालीनाथ कालेेश्वर महादेव Sri Kalinath Kaleshavr Mahadev Mandir

गरली से हम एक संकरी पहाड़ी सड़क से आगे बढ़ते हैं। लगभग 4–5 किलोमीटर आगे जाकर यही सड़क हमें ब्यास नदी Beas River के किनारे पहुँचा देती है। ब्यास नदी शांत भाव से बह रही थी। हवा में एक अद्भुत सुगंध थी, मानो पहाड़ों ने सदियों की तपस्या का रस उसमें घोल दिया हो। मैं और मेरी पत्नी कुछ देर नदी किनारे बैठते हैं और अनंत प्रकृति को अपने भीतर तक महसूस करते हैं।

यहाँ से हम नदी के साथ-साथ उस दिशा में चलने लगते हैं जिधर से पानी आ रहा था। नदी के दक्षिणी किनारे पर एक ओर गहरी खाई में नदी बह रही थी और दूसरी ओर ऊँचे पहाड़ थे, जो घनी वनस्पति से ढके हुए थे। ऐसा प्रतीत होता था जैसे हमारी कार के साथ-साथ दो युवतियाँ दौड़ रही हों—एक ने नीली चुन्नी ओढ़ रखी हो और दूसरी ने हरी। थोड़ी ही देर में हम श्री कालीनाथ कालेेश्वर महादेव मंदिर Sri Kalinath Kaleshavr Mahadev Mandir पहुँच जाते हैं।

कार पार्क करके जब हम ब्यास के किनारे बने इस प्राचीन मंदिर में पहुँचे, तो पास से बहती ब्यास के जल की कल-कल सुनाई देने लगी, जो मन की उलझनों को शांत करने के लिए पर्याप्त थी। ब्यास कुंड Beas Kund से निकलने वाली ब्यास नदी यहाँ से थोड़ा आगे जाकर मनुष्य द्वारा बनाए गए विशाल कुंड पोंग डैम Pong Dam में जाकर मानो विश्राम करती है, जैसे पहाड़ों से तेज़ गति से उतरने की थकान उतार रही हो।

मंदिर के सामने बने छोटे से बाज़ार से पूजा की थाली लेने के बाद हम मंदिर में पहुँचते हैं। मुख्य द्वार के अंदर मुख्य मंदिर के अलावा कुछ छोटे मंदिर भी बने हुए हैं। सुनहरे गुंबदों वाले ये मंदिर एक अलौकिक दृश्य रचते हैं, जहाँ आकर मन दुनिया की उलझनों से मुक्त हो जाता है। मंदिर की प्राचीन वास्तुकला में कांगड़ा Kangra के कटोच राजवंश का भी बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने समय-समय पर इस मंदिर की सेवा, देखभाल और नवीनीकरण करवाया।

मंदिर के गर्भगृह में धरती के भीतर की ओर जाते हुए स्थापित शिवलिंग के दर्शन करते समय एक अजीब सी शीतलता महसूस हुई। धूप-बत्तियों की सुगंध और घंटियों की ध्वनि ने वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया था। आँखें बंद करते ही ऐसा लगा जैसे सारी सृष्टि एक ही बिंदु में सिमट आई हो। यहाँ माँगने के लिए कुछ नहीं था—सिर्फ कृतज्ञता थी।

हम यहाँ नतमस्तक होने के बाद कुछ देर बैठते हैं और पुजारी से इस स्थान की कथा सुनते हैं।

पुजारी कथा सुनाने लगते हैं—कहते हैं कि सतयुग में जब दैत्यों ने भगवान शिव से वरदान प्राप्त कर लिए, तो उन्होंने पृथ्वी पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता पंचायत के रूप में भगवान शिव के पास सहायता की गुहार लेकर पहुँचे।

भगवान शिव ने अपनी योगमाया से माता महाकाली की रचना की और उन्हें दैत्यों का नाश करने के लिए भेजा। माता महाकाली ने दैत्यों का संहार कर दिया, लेकिन इस युद्ध में उनका क्रोध अत्यधिक बढ़ गया। देवताओं को चिंता हुई कि कहीं उनका यह क्रोध सृष्टि को नष्ट न कर दे। वे फिर भगवान शिव के पास पहुँचे।

पुजारी आगे बताते हैं कि भगवान शिव मानव रूप धारण करके माता महाकाली के मार्ग में लेट गए। जब माता महाकाली Mata Mahakali का पैर भगवान शिव Lord Shiva के हृदय को छू गया, तो उनका क्रोध तुरंत शांत हो गया। लेकिन अब उन्हें पश्चाताप होने लगा कि उन्होंने अपने चरणों से भगवान शिव को स्पर्श किया, जो सबके आराध्य हैं।

तब माता महाकाली ने भगवान शिव से पूछा कि इस अपराध का प्रायश्चित कैसे हो सकता है। भगवान शिव ने उन्हें इसी स्थान पर तपस्या करने को कहा। मुख्य मंदिर में जो पवित्र शिवलिंग है, वह एक गहरे गड्ढे में स्थित है और मान्यता है कि यह हर वर्ष चावल के दाने जितना नीचे धँसता जा रहा है।

पुजारी बताते हैं कि जिस दिन यह पूरी तरह धरती में समा जाएगा, उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा।

मैं सोचने लगा—सतयुग में शुरू हुई यह कथा चारों युगों तक फैल जाएगी। सृष्टिकर्ता की रचना का कैनवास कितना विशाल है!

इसके साथ ही यहाँ एक पंचतीर्थ मंदिर Panchtirth Mandir भी है। श्री कालीनाथ कालेेश्वर महादेव Sri Kalinath Kaleshavr Mahadev Mandir के दर्शन के बाद हम इस मंदिर में पहुँचते हैं। कहा जाता है कि अपने वनवास के दौरान पांडव Pandva इस क्षेत्र में रुके थे। उसी समय कुंभ स्नान का अवसर आया, पर वनवास के कारण पांडव और द्रौपदी काशी नहीं जा सके। तब पांडवों ने भगवान की आराधना करके तीर चलाया और यहाँ एक जलधारा प्रकट की।

कहा जाता है कि यह स्थान उतना ही पवित्र है जितना काशी (बनारस)। इस मंदिर के कुंड में आज भी पर्वत से एक जलधारा आती है और यहाँ स्नान करने से पाँच तीर्थों के स्नान के बराबर पुण्य मिलता है। इसे मातृका कुंड भी कहा जाता है।

पास बह रही ब्यास का निर्मल जल इतना पारदर्शी था कि नीचे पड़े पत्थर भी किसी साफ विचार की तरह दिखाई दे रहे थे। यहाँ बैठकर लगा कि मनुष्य प्रकृति के कितना करीब है। लहरों की आवाज़ “ॐ नमः शिवाय” के जप जैसी प्रतीत हो रही थी। श्रद्धालु पंचतीर्थ कुंड के पवित्र जल में स्नान कर अपने मन की मलिनता धो रहे थे।

पांडवों से जुड़ी एक और कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि जब पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहाँ ठहरे थे, तब उन्होंने इस पवित्र स्थान पर भगवान शिव की आराधना की थी।

एक मान्यता यह भी है कि पांडवों ने यहाँ ब्यास नदी के किनारे से स्वर्ग तक पहुँचने के लिए “स्वर्ग की सीढ़ी” Stair to Heaven” बनाने की कोशिश की थी। शर्त यह थी कि यह सीढ़ी एक ही रात में पूरी होनी चाहिए।

पांडव तेजी से काम करने लगे, लेकिन जब वे अंतिम सीढ़ी बना रहे थे, तब भगवान ने उनकी परीक्षा लेने के लिए मुर्गे की बाँग की आवाज़ निकाल दी। पांडवों को लगा कि सुबह हो गई है और उनका काम अधूरा रह गया।

यह स्थान एक और कारण से भी विशेष है। यहाँ ब्यास नदी Beas River का प्रवाह उल्टी दिशा में, अर्थात उत्तर की ओर हो जाता है। नदी की ऐसी अवस्था को वाम वाहिनी North Flowing River कहा जाता है। हिंदू शास्त्रों में जहाँ भी नदी उत्तर-वाहिनी होती है, उस स्थान को अत्यंत पवित्र और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। इसी कारण इसे “छोटा हरिद्वार” भी कहा जाता है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कालेेश्वर महादेव में किया गया स्नान और पूजा उतनी ही फलदायी मानी जाती है जितनी काशी (बनारस) में। यह विश्वास है कि यदि कोई हरिद्वार या काशी नहीं जा सकता, तो कालेेश्वर के दर्शन से भी उसे वही आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है। यहाँ भगवान शिव का “कालेेश्वर” (काल के स्वामी) रूप में होना इसे मृत्यु और मोक्ष के महत्व से जोड़ता है।

जब हम गरली से चले थे तो हमें इस मंदिर के बारे में पता चला और हम यहाँ तक आए। लेकिन यहाँ पहुँचकर एक स्थानीय व्यक्ति हमें पास ही स्थित एक और चौमुख शिव मंदिर का रास्ता बता देता है।

हमारे पास समय भी पर्याप्त था, इसलिए वापस लौटने की बजाय हम नदौन की ओर जाने वाली सड़क पर आगे बढ़ जाते हैं।

इससे आगे की रोचक कथा अगली कड़ी में।

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