खंडहर बना अतीत
सीकर से सरदारशहर की ओर बढ़ते हुए हमें रास्ते में सड़क किनारे एक पुरानी इमारत के अवशेष दिखाई देते हैं। सड़क की ओर एक दरवाज़ा था, जिसके ऊपर गुंबद बने हुए थे। इस मार्ग से गुजरते हुए पहले भी कई बार मैंने इसे देखा था, पर झाड़ियों से ढका और सुनसान इलाके में होने के कारण कभी रुकने का अवसर नहीं मिला। आज मैं और विजयपाल इसके गेट के पास आकर गाड़ी रोक देते हैं।

सड़क से देखने पर यह किसी पुरानी हवेली जैसा प्रतीत होता था, पर जब हम इसके भीतर गए तो खंडहर बने अतीत को देखकर हमारी आँखें खुली की खुली रह गईं। यह एक शानदार तालाब था, जिसमें वर्षा का पानी भरता था। यह लगभग एक बीघा क्षेत्र में फैला हुआ होगा। इसके चारों ओर चारदीवारी बनी थी। दीवारों के नीचे वर्षा का पानी भीतर लाने के लिए नालीनुमा खुले स्थान बने हुए थे। पूरी सममिति में बने इस ढाँचे की चारों दिशाओं की दीवारों के मध्य द्वार बने थे, जिनके ऊपर छतरियों के रूप में बैठने का स्थान बनाया गया था।
द्वार के दोनों ओर से अंदर की तरफ इन छतरियों तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी थीं। उत्तर दिशा का द्वार बंद था, क्योंकि उसके बाहर की ओर जानवरों के लिए वर्षा जल संग्रह करने का अलग तालाब था। उसके दक्षिण की ओर इस मुख्य बावड़ी की दीवार और पूर्व-पश्चिम में पक्की दीवारें थीं, जबकि उत्तर दिशा खुली थी और उस ओर ढलान दी गई थी ताकि पशु आसानी से अंदर आकर पानी पी सकें। हालांकि ऊपर छतरी उत्तर दिशा में भी बनी हुई थी। इसी प्रकार चारों कोनों पर भी छतरियाँ बनी थीं और वहाँ तक जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं।

तालाब के भीतर की ओर भी सीढ़ियों से उतरा जा सकता था। इसके मध्य में एक चबूतरे पर फिर एक सुंदर छतरी बनी हुई थी और उसके आधार के साथ-साथ घूमावदार सीढ़ी बनाई गई थी।
यह वास्तव में देखने योग्य स्थान था, पर इसकी स्थिति दयनीय थी। इतने वर्षों के बीत जाने के बावजूद भी यह ढाँचा काफी हद तक सुरक्षित था। छतरियों के भीतर छत पर कभी रंगीन कलाकृतियाँ बनी रही होंगी, जिनके धुंधले रंग आज भी अतीत की गौरवगाथा सुना रहे थे।
हमारे पूर्वजों का प्राकृतिक जल संरक्षण का तरीका कितना अद्भुत था! परंतु हम उनकी विरासत को भी संभालने योग्य नहीं रहे। यह बावड़ी किसने और कब बनवाई, इसका कोई शिलालेख हमें वहाँ नहीं मिला। ऑनलाइन भी इसके बारे में कुछ जानकारी नहीं मिली।
जब हम वापस लौटने लगे तो विजयपाल की नज़र सड़क के दूसरी ओर घने करीर के पेड़ों के बीच छिपी एक दीवार पर पड़ी। हम वहाँ भी जाकर देखते हैं। यह एक प्राचीन कुआँ था। इसमें से ऊँट या बैलों के माध्यम से मशक खींचकर पानी निकाला जाता था। इसके ऊपर बने चबूतरे के तीन ओर पानी की खेले (नालियाँ) बनी थीं। एक बड़ी पानी संग्रह करने वाली डिग्गी भी इसी चबूतरे में बनी थी। तीनों ओर की खेलों में से एक ओर की खेल पशुओं के लिए थी और दो ओर की मनुष्यों के लिए।
यह करीर, कीकर और झाड़ियों में छिपा हुआ कुआँ था, पर इसकी हालत भी इतने वर्षों बाद मजबूत प्रतीत हो रही थी। शायद इसके निर्माण का ठेका नहीं दिया गया होगा, बल्कि यह कारसेवा से बनाया गया होगा।
यहाँ रुकना सार्थक रहा, विजय ने गाड़ी में बैठते हुए कहा।
हाँ, यदि नहीं रुकते तो यह स्थान छूट जाता, मैंने सहमति में कहा।
अब हम अपनी गाड़ी पंजाब की ओर मोड़ लेते हैं। रास्ते में हम रावतसर में बाबा रामदेव जी का एक प्राचीन मंदिर देखते हुए देर शाम तक पंजाब की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं—किसी नई यात्रा में फिर मिलने के वादे के साथ।
