पंजाब का सबसे ऊँचा शिव मंदिर – गगन जी का टिल्ला
अप्रैल महीने की एक सुहानी शाम। मैंने तलवाड़ा से अपना सफर शुरू किया। मंज़िल थी—पंजाब का सबसे ऊँचा शिव मंदिर। वैसे तो इस मंदिर तक पहुँचने के लिए दसूहा से हाजीपुर वाली सड़क से जाना पड़ता है। यह भी बता दें कि दसूहा जालंधर–पठानकोट रोड पर स्थित होशियारपुर जिले की एक तहसील है। लेकिन मैंने तलवाड़ा से दातारपुर होते हुए एक बड़ी नहर की पटरी वाला रास्ता चुना, ताकि प्रकृति को नज़दीक से देखा जा सके।

सड़क दोबारा बन रही थी, अभी उस पर तारकोल नहीं पड़ा था, लेकिन फिर भी गाड़ी आराम से चल रही थी। एक तरफ शिवालिक की पहाड़ियाँ मेरे साथ-साथ चल रही थीं और दूसरी ओर पोंग डैम से निकलने वाली शाह नहर की एक बड़ी शाखा बह रही थी। रास्ते में कुछ छोटे-छोटे गाँव भी आए।
लगभग 15 किलोमीटर का सफर तय करके मैं गाँव सहौड़ा कंडी पहुँच गया। यहीं स्थित है पंजाब का सबसे ऊँचा शिव मंदिर, जहाँ तक पहुँचने के लिए 750 से अधिक सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। यह मंदिर जितना ऊँचा है, उतना ही इसका इतिहास भी प्राचीन है।
मंदिर के मुख्य द्वार पर पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है। मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों के अलावा अब मंदिर समिति ने जीप की व्यवस्था भी की है। मैंने ऊपर जाते समय जीप का अनुभव लिया और वापसी सीढ़ियों से की। चारों ओर हरियाली और शिवालिक की पहाड़ियों के बीच स्थित यह मंदिर अलौकिक आनंद का अनुभव कराता है।
कहा जाता है कि जब पांडवों को 13 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला, तो उन्होंने अपना अज्ञातवास विराट नगर में बिताया था। आज का दसूहा ही प्राचीन विराट नगर माना जाता है। होशियारपुर और कांगड़ा की शिवालिक पहाड़ियों से पांडवों के वनवास से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं। आज हम गगन जी के टिल्ले के इस मंदिर के दर्शन करते हैं।

जीप के माध्यम से सीढ़ियों के साथ बने रास्ते से ऊपर की ओर चढ़ाई शुरू होती है। चढ़ाई बहुत तीखी है और चारों ओर घना जंगल है। नीचे की ओर मैदानों में गेहूँ के खेत दिखाई देते हैं और ऊपर की ओर पहाड़ियों पर हरियाली ही हरियाली। संभवतः इसी घने जंगल के कारण पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में आए होंगे।
कहा जाता है कि पांडवों ने यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए तथा यहाँ शिवलिंग स्थापित करने का आशीर्वाद दिया। पांडवों ने इस स्थान पर शिवलिंग स्थापित कर मंदिर का निर्माण किया और अज्ञातवास के दौरान भी समय-समय पर यहाँ आकर पूजा करते रहे।
मुख्य मंदिर की ओर बढ़ते हुए रास्ते में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है, जो मानो भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए आगे बढ़ आई हो। मंदिर की देखरेख एक स्थानीय समिति करती है और उनके प्रबंध बहुत अच्छे हैं।
पहाड़ी की चोटी पर पहुँचते ही सुनहरे गुंबद वाला यह प्राचीन शिव मंदिर दिखाई देता है, जिसे देखकर मन को गहरी शांति मिलती है। मंदिर के सामने एक बड़ा पीपल का पेड़ है और पास ही बच्चों के लिए एक छोटा पार्क भी बनाया गया है। कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर मुख्य मंदिर तक पहुँचा जा सकता है।

भगवान शिव के वाहन नंदी मंदिर के ठीक सामने विराजमान हैं। सफेद संगमरमर के शिवलिंग पर निरंतर जलधारा बह रही है। मंदिर के भीतर अद्भुत शांति का अनुभव होता है। चारों ओर शिवालिक की पहाड़ियों में पक्षियों की मधुर आवाजें गूँजती हैं और दूर धौलाधार पर्वत श्रृंखला दिखाई देती है। नीचे मैदानों में फैले खेत और गाँव का दृश्य अत्यंत मनमोहक लगता है।

इस स्थान को “गगन जी का टिल्ला” क्यों कहा जाता है, यह जानने के लिए मैंने वहाँ मौजूद एक पुजारी से पूछा। उन्होंने बताया कि हिमाचल का एक राजा यहाँ से गुजर रहा था, जिसकी कोई संतान नहीं थी। उसने इस पहाड़ी पर एक चमकता हुआ शिवलिंग देखा और संतान प्राप्ति की प्रार्थना की। समय आने पर उसके घर एक पुत्री का जन्म हुआ, जिसका नाम गगन रखा गया। इसी कारण इस स्थान का नाम गगन जी का टिल्ला पड़ गया और राजा ने यहाँ मंदिर बनवाया।
मुख्य मंदिर के पास ही भगवान गणेश जी, सामने हनुमान जी और माता रानी के मंदिर भी स्थित हैं। कुछ समय मंदिर में शांति का अनुभव करने के बाद मैं पीछे बने लंगर हॉल में पहुँचा, जहाँ चने की दाल और चावल का भोजन प्रसाद ग्रहण किया। इस लंगर ने मन को तृप्त कर दिया।
अब सूर्य अस्त होने की ओर बढ़ रहा था। लालिमा से भरा आकाश और पहाड़ियों का दृश्य अत्यंत सुंदर लग रहा था। मैं सीढ़ियों के रास्ते नीचे उतरने लगा। रास्ते में गाँवों के लोग और कुछ पर्यटक अभी भी मंदिर की ओर जा रहे थे। पेड़ों में पक्षियों की चहचहाहट प्रकृति की स्तुति कर रही थी।
आखिरी सीढ़ी पर पहुँचकर मैंने एक बार फिर मंदिर की ओर नमन किया और मन में शांति व संतोष लेकर अपनी वापसी का सफर शुरू कर दिया।
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